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Rigveda Mandal 3 / Sukta 2 / Mantra 15

62 Sukta
15 Mantra
3/2/15
Devata- अग्निर्वैश्वानरः Rishi- गाथिनो विश्वामित्रः Chhanda- निचृज्जगती Swara- निषादः
Mantra with Swara
म॒न्द्रं होता॑रं॒ शुचि॒मद्व॑याविनं॒ दमू॑नसमु॒क्थ्यं॑ वि॒श्वच॑र्षणिम्। रथं॒ न चि॒त्रं वपु॑षाय दर्श॒तं मनु॑र्हितं॒ सद॒मिद्रा॒य ई॑महे॥

म॒न्द्रम् । होता॑रम् । शुचि॑म् । अद्व॑याविनम् । दमू॑नसम् । उ॒क्थ्य॑म् । वि॒श्वऽच॑र्षणिम् । रथ॑म् । न । चि॒त्रम् । वपु॑षाय । द॒र्श॒तम् । मनुः॑ऽहितम् । सद॑म् । इत् । रा॒यः । ई॒म॒हे॒ ॥

Mantra without Swara
मन्द्रं होतारं शुचिमद्वयाविनं दमूनसमुक्थ्यं विश्वचर्षणिम्। रथं न चित्रं वपुषाय दर्शतं मनुर्हितं सदमिद्राय ईमहे॥

मन्द्रम्। होतारम्। शुचिम्। अद्वयाविनम्। दमूनसम्। उक्थ्यम्। विश्वऽचर्षणिम्। रथम्। न। चित्रम्। वपुषाय। दर्शतम्। मनुःऽहितम्। सदम्। इत्। रायः। ईमहे॥

Ashtak » 2 Adhyay » 8 Varga » 19 Mantra » 5

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1 Bhashyas
Meaning
हे मनुष्यो ! हम लोग जिस (होतारम्) ग्रहण करने और (मन्द्रम्) आनन्द देनेवाले (दमूनसम्) दमनशील (उक्थ्यम्) प्रशंसा करने योग्य (शुचिम्) पवित्र (विश्वचर्षणिम्) सबके देखने और (मनुर्हितम्) मनुष्यों के हित करने करनेवाले विद्वान् को प्राप्त होकर (रथम्) दृढ रमणीय यान के (न) समान (चित्रम्) अद्भुत और (वपुषाय) जिस व्यवहार में रूप विद्यमान उस व्यवहार के लिये (दर्शतम्) देखने योग्य (सदम्) अवस्थित और (अद्वयाविनम्) जो दो में नहीं विद्यमान ऐसे सीधे चलनेवाले अग्नि को (ईमहे) जांचते और उससे (रायः) धनों को जाँचते हैं, उस (इत्) ही को तुम लोग भी जाँचो ॥१५॥
Essence
जो इन्द्रियों को दमन करनेवाले विद्वानों के निकट स्थित होकर अग्निविद्या को जानें, तो मनुष्य किस-किस धन को न प्राप्त हों ? ॥१५॥ इस सूक्त में विद्वान् और अग्नि के गुणों का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की पिछले सूक्तार्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये ॥ यह दूसरा सूक्त और उन्नीसवाँ वर्ग पूर्ण हुआ ॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है।