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Rigveda Mandal 3 / Sukta 2 / Mantra 14

62 Sukta
15 Mantra
3/2/14
Devata- अग्निर्वैश्वानरः Rishi- गाथिनो विश्वामित्रः Chhanda- निचृज्जगती Swara- निषादः
Mantra with Swara
शुचिं॒ न याम॑न्निषि॒रं स्व॒र्दृशं॑ के॒तुं दि॒वो रो॑चन॒स्थामु॑ष॒र्बुध॑म्। अ॒ग्निं मू॒र्धानं॑ दि॒वो अप्र॑तिष्कुतं॒ तमी॑महे॒ नम॑सा वा॒जिनं॑ बृ॒हत्॥

शुचि॑म् । न । याम॑न् । इ॒षि॒रम् । स्वः॒ऽदृश॑म् । के॒तुम् । दि॒वः । रो॒च॒न॒ऽस्थाम् । उ॒षः॒ऽबुध॑म् । अ॒ग्निम् । मू॒र्धान॑म् । दि॒वः । अप्र॑तिऽस्कुतम् । तम् । ई॒म॒हे॒ । नम॑सा । वा॒जिन॑म् । बृ॒हत् ॥

Mantra without Swara
शुचिं न यामन्निषिरं स्वर्दृशं केतुं दिवो रोचनस्थामुषर्बुधम्। अग्निं मूर्धानं दिवो अप्रतिष्कुतं तमीमहे नमसा वाजिनं बृहत्॥

शुचिम्। न। यामन्। इषिरम्। स्वःऽदृशम्। केतुम्। दिवः। रोचनऽस्थाम्। उषःऽबुधम्। अग्निम्। मूर्धानम्। दिवः। अप्रतिऽस्कुतम्। तम्। ईमहे। नमसा। वाजिनम्। बृहत्॥

Ashtak » 2 Adhyay » 8 Varga » 19 Mantra » 4

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Meaning
हे मनुष्यो ! हम लोग विद्वानों की उत्तेजना से (नमसा) सत्कार से जिस (शुचिम्) पवित्र और पवित्र करनेवाले के (न) समान (यामन्) जिसके गमन करते हैं उस मार्ग में (इषिरम्) इच्छा करने योग्य (स्वर्दृशम्) जिससे कि सुख दीखता है उस (केतुम्) रूपादिप्रापक (दिवः) प्रकाश के बीच (रोचनस्थाम्) उजाले में स्थित होने (उषर्बुधम्) प्रातःकाल बोध दिलाने और (दिवः) दिव्य आकाश के बीच (मूर्द्धानम्) खींचने से बाँधने (अप्रतिष्कुतम्) इधर-उधर से लोकान्तर के चारों ओर से भ्रमणरहित (बृहत्) महान् (वाजिनम्) बहुत वेगवाले (अग्निम्) अग्नि को (ईमहे) याचते हैं (तम्) उस अग्नि को उन हम लोगों से तुम भी चाहो वा माँगो ॥१४॥
Essence
मनुष्यों को आप्त विद्वानों से अग्न्यादि विद्या प्राप्त करनी चाहिये, जो जिससे विद्या ग्रहण की इच्छा करे, वह उसका निरन्तर सत्कार करे, सूर्य किसी लोक का परिक्रमण नहीं करता और सबसे बड़ा भी है ॥१४॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है।

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