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Rigveda Mandal 3 / Sukta 2 / Mantra 12

62 Sukta
15 Mantra
3/2/12
Devata- अग्निर्वैश्वानरः Rishi- गाथिनो विश्वामित्रः Chhanda- निचृज्जगती Swara- निषादः
Mantra with Swara
वै॒श्वा॒न॒रः प्र॒त्नथा॒ नाक॒मारु॑हद्दि॒वस्पृ॒ष्ठं भन्द॑मानः सु॒मन्म॑भिः। स पू॑र्व॒वज्ज॒नय॑ञ्ज॒न्तवे॒ धनं॑ समा॒नमज्मं॒ पर्ये॑ति॒ जागृ॑विः॥

वै॒श्वा॒न॒रः । प्र॒त्नऽथा॑ । नाक॑म् । आ । अ॒रु॒ह॒त् । दि॒वः । पृ॒ष्ठम् । भन्द॑मानः । सु॒मन्म॑ऽभिः । सः । पू॒र्व॒ऽवत् । ज॒नय॑न् । ज॒न्तवे॑ । धन॑म् । स॒मा॒नम् । अज्म॑म् । परि॑ । ए॒ति॒ । जागृ॑विः ॥

Mantra without Swara
वैश्वानरः प्रत्नथा नाकमारुहद्दिवस्पृष्ठं भन्दमानः सुमन्मभिः। स पूर्ववज्जनयञ्जन्तवे धनं समानमज्मं पर्येति जागृविः॥

वैश्वानरः। प्रत्नऽथा। नाकम्। आ। अरुहत्। दिवः। पृष्ठम्। भन्दमानः। सुमन्मऽभिः। सः। पूर्वऽवत्। जनयन्। जन्तवे। धनम्। समानम्। अज्मम्। परि। एति। जागृविः॥

Ashtak » 2 Adhyay » 8 Varga » 19 Mantra » 2

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1 Bhashyas
Meaning
जो (भन्दमानः) कल्याण को करता हुआ (जागृविः) जागता सा (वैश्वानरः) अग्नि (प्रत्नथा) पुरातन के समान (दिवः) दिव्य आकाश के समान (पृष्ठम्) पर भाग (नाकम्) स्वर्ग सुख भोग विशेष को (आरुहत्) चढ़ता है जो (अज्मम्) गमन होनेवाले मार्ग में (पर्य्येति) सब ओर से जाता है (जन्तवे) वा प्राणी के लिये (समानम्) तुल्य (धनम्) धन को (पूर्ववत्) पूर्व के समान (जनयन्) उत्पन्न करता है (सः) वह (सुमन्मभिः) समस्त उत्तम विचारवाले विद्वानों को विशेषता से जानने योग्य है ॥१२॥
Essence
इस मन्त्र में उपमा और वाचकलुप्तोपमालङ्कार हैं। यह अग्नि अपूर्व नहीं है, जो व्यतीत हुए कल्पों में जैसा हुआ वैसा ही अब वर्त्तमान है, भविष्यत्काल में भी होगा। यदि यह सबका प्रकाशक के समान रवि के योग से कार्यकारी वर्त्तमान है तो वह यथावत् जाना और प्रयोग किया हुआ मङ्गल का अच्छे प्रकार देनेवाला होता है ॥१२॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है।