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Rigveda Mandal 3 / Sukta 2 / Mantra 11

62 Sukta
15 Mantra
3/2/11
Devata- अग्निर्वैश्वानरः Rishi- गाथिनो विश्वामित्रः Chhanda- विराड्जगती Swara- निषादः
Mantra with Swara
स जि॑न्वते ज॒ठरे॑षु प्रजज्ञि॒वान्वृषा॑ चि॒त्रेषु॒ नान॑द॒न्न सिं॒हः। वै॒श्वा॒न॒रः पृ॑थृ॒पाजा॒ अम॑र्त्यो॒ वसु॒ रत्ना॒ दय॑मानो॒ वि दा॒शुषे॑॥

सः । जि॒न्व॒ते॒ । ज॒ठरे॑षु । प्र॒ज॒ज्ञि॒ऽवान् । वृषा॑ । चि॒त्रेषु॑ । नान॑दत् । न । सिं॒हः । वै॒श्वा॒न॒रः । पृ॒थु॒ऽपाजाः॑ । अम॑र्त्यः । वसु॑ । रत्ना॑ । दय॑मानः । वि । दा॒शुषे॑ ॥

Mantra without Swara
स जिन्वते जठरेषु प्रजज्ञिवान्वृषा चित्रेषु नानदन्न सिंहः। वैश्वानरः पृथृपाजा अमर्त्यो वसु रत्ना दयमानो वि दाशुषे॥

सः। जिन्वते। जठरेषु। प्रजज्ञिऽवान्। वृषा। चित्रेषु। नानदत्। न। सिंहः। वैश्वानरः। पृथुऽपाजाः। अमर्त्यः। वसु। रत्ना। दयमानः। वि। दाशुषे॥

Ashtak » 2 Adhyay » 8 Varga » 19 Mantra » 1

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Meaning
मनुष्यों को उचित है कि जो (जठरेषु) उदरों में (प्रजज्ञिवान्) प्रबलता से उत्पन्न होता हुआ (चित्रेषु) अद्भुत स्थानों में (वृषा) वीर्य करनेवाला (पृथुपाजाः) विस्तीर्ण बलवान् (अमर्त्यः) मरण-धर्मरहित (वैश्वानरः) सबका नायक (दाशुषे) दान करनेवाले के लिये (रत्ना) रमणीय हीरा आदि मणिरूप (वसु) धन को (दयमानः) देता हुआ (सिंहः) सिंह के समान (न, नानदत्) निरन्तर शब्द नहीं करता है (सः) वह सबको (वि जिन्वते) विशेषता से तृप्त करता है, ऐसा जानें ॥११॥
Essence
इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। मनुष्यों को अग्नि में अद्भुत गुण-कर्म-स्वभावों को जान के अतुल लक्ष्मियों को सिद्ध कर अच्छे मार्गों में देनेवालों को देनी चाहिये। जो जाठराग्नि शान्त हो तो किसी के जीवन का संभव न हो और न इसके बिना बल भी कोई पा सकता है ॥११॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है।

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