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Rigveda Mandal 3 / Sukta 2 / Mantra 10

62 Sukta
15 Mantra
3/2/10
Devata- अग्निर्वैश्वानरः Rishi- गाथिनो विश्वामित्रः Chhanda- जगती Swara- निषादः
Mantra with Swara
वि॒शां क॒विं वि॒श्पतिं॒ मानु॑षी॒रिषः॒ सं सी॑मकृण्व॒न्त्स्वधि॑तिं॒ न तेज॑से। स उ॒द्वतो॑ नि॒वतो॑ याति॒ वेवि॑ष॒त्स गर्भ॑मे॒षु भुव॑नेषु दीधरत्॥

वि॒शाम् । क॒विम् । वि॒श्पति॑म् । मानु॑षीः । इषः॑ । सम् । सी॒म् । अ॒कृ॒ण्व॒न् । स्वऽधि॑तिम् । न । तेज॑से । सः । उ॒त्ऽवतः॑ । नि॒ऽवतः॑ । या॒ति॒ । वेवि॑षत् । सः । गर्भ॑म् । ए॒षु । भुव॑नेषु । दी॒ध॒र॒त् ॥

Mantra without Swara
विशां कविं विश्पतिं मानुषीरिषः सं सीमकृण्वन्त्स्वधितिं न तेजसे। स उद्वतो निवतो याति वेविषत्स गर्भमेषु भुवनेषु दीधरत्॥

विशाम्। कविम्। विश्पतिम्। मानुषीः। इषः। सम्। सीम्। अकृण्वन्। स्वऽधितिम्। न। तेजसे। सः। उत्ऽवतः। निऽवतः। याति। वेविषत्। सः। गर्भम्। एषु। भुवनेषु। दीधरत्॥

Ashtak » 2 Adhyay » 8 Varga » 18 Mantra » 5

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1 Bhashyas
Meaning
जिस (विशाम्) प्रजाओं में (कविम्) प्रविष्ट बुद्धिवाले (विश्पतिम्) प्रजापालक विद्वान् को (मानुषीः) मनुष्यों की (इषः) इच्छा (तेजसे) तेज के लिये (स्वधितिम्) वज्र के (न) समान (सीम्) सब ओर से (अकृण्वन्) परिपूर्ण करती हैं (सः) वह (उद्वतः) ऊपर से और (निवतः) नीचे के मार्गों को (संयाति) अच्छे प्रकार जाता है और (सः) वह (एषु) इन (भुवनेषु) स्थिति करने के आधाररूप लोक-लोकान्तरों में (वेविषत्) निरन्तर व्याप्त होता है और (गर्भम्) गर्भ को (दीधरत्) धारण करता है ॥१०॥
Essence
जैसे गर्भ अदृश्य होता है, वैसे अग्नि भी सब पदार्थों में वर्त्तमान है, जो मनुष्य इसको साधक करें तो इस अग्नि से युक्त यानों से भूमि और आकाश मार्गों को और नीचे ऊपरली गतियों को कर सकें और प्रजा भी पाल सकें ॥१०॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है।