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Rigveda Mandal 3 / Sukta 2 / Mantra 1

62 Sukta
15 Mantra
3/2/1
Devata- अग्निर्वैश्वानरः Rishi- गाथिनो विश्वामित्रः Chhanda- जगती Swara- निषादः
Mantra with Swara
वै॒श्वा॒न॒राय॑ धि॒षणा॑मृता॒वृधे॑ घृ॒तं न पू॒तम॒ग्नये॑ जनामसि। द्वि॒ता होता॑रं॒ मनु॑षश्च वा॒घतो॑ धि॒या रथं॒ न कुलि॑शः॒ समृ॑ण्वति॥

वै॒श्वा॒न॒राय॑ । धि॒षणा॑म् । ऋ॒त॒ऽवृधे॑ । घृ॒तम् । न । पू॒तम् । अ॒ग्नये॑ । ज॒ना॒म॒सि॒ । द्वि॒ता । होता॑रम् । मनु॑षः । च॒ । वा॒घतः॑ । धि॒या । रथ॑म् । न । कुलि॑शः । सम् । ऋ॒ण्व॒ति॒ ॥

Mantra without Swara
वैश्वानराय धिषणामृतावृधे घृतं न पूतमग्नये जनामसि। द्विता होतारं मनुषश्च वाघतो धिया रथं न कुलिशः समृण्वति॥

वैश्वानराय। धिषणाम्। ऋतऽवृधे। घृतम्। न। पूतम्। अग्नये। जनामसि। द्विता। होतारम्। मनुषः। च। वाघतः। धिया। रथम्। न। कुलिशः। सम्। ऋण्वति॥

Ashtak » 2 Adhyay » 8 Varga » 17 Mantra » 1

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Meaning
हे मनुष्यो ! जैसे हम लोग (ऋतावृधे) सत्य के बढ़ानेवाले (वैश्वानराय) समस्त मनुष्यों में प्रकाशमान (अग्नये) अग्नि के लिये (पूतम्) पवित्र (घृतम्) घृत के (न) समान (धिषणाम्) प्रगल्भ बुद्धि को (जनामसि) उत्पन्न करें (वाघतः) मेधावी जन (धिया) प्रज्ञा वा कर्म से (कुलिशः) वज्र (रथम्) रथ को (न) जैसे वैसे (समृण्वति) अच्छे प्रकार प्राप्त होता (द्विता) दो के होने (होतारम्) होमकर्ता मनुष्य (च) और (मनुषः) मनुष्यों को सम्यक् प्राप्त होता वैसे ही तुम भी आचरण करो ॥१॥
Essence
इस मन्त्र में उपमा और वाचकलुप्तोपमालङ्कार हैं। जैसे ऋत्विग् जन घृत आदि हवि को अच्छे प्रकार शोध कर अग्नि में हवन करने से अग्नि की वृद्धि करते हैं, वैसे अध्यापक और उपदेशक जन शिष्यों तथा श्रोताओं की बुद्धियों को बढ़ावें, जैसे कुल्हाड़ी आदि साधनों से काष्ठ छील कर यान बनाये जाते हैं, वैसे उत्तम शिक्षा और ताड़नाओं से शिष्य लोग विद्या से संपन्न किये जावें, जैसे अध्यापक और अध्येता प्रीति से वर्त्तमान हैं, वैसे सबको वर्त्तमान करना चाहिये ॥१॥
Subject
अब पन्द्रह ऋचावाले दूसरे सूक्त का आरम्भ है। इसके प्रथम मन्त्र में विद्वानों के गुणों का उपदेश किया है।

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