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Rigveda Mandal 3 / Sukta 19 / Mantra 2

62 Sukta
5 Mantra
3/19/2
Devata- अग्निः Rishi- गाथी कौशिकः Chhanda- विराट्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
प्र ते॑ अग्ने ह॒विष्म॑तीमिय॒र्म्यच्छा॑ सुद्यु॒म्नां रा॒तिनीं॑ घृ॒ताची॑म्। प्र॒द॒क्षि॒णिद्दे॒वता॑तिमुरा॒णः सं रा॒तिभि॒र्वसु॑भिर्य॒ज्ञम॑श्रेत्॥

प्र । ते॒ । अ॒ग्ने॒ । ह॒विष्म॑तीम् । इ॒य॒र्मि॒ । अच्छ॑ । सु॒ऽद्यु॒म्नाम् । रा॒तिनी॑म् । घृ॒ताची॑म् । प्र॒ऽद॒क्षि॒णित् । दे॒वता॑तिम् । उ॒रा॒णः । सम् । रा॒तिऽभिः॑ । वसु॑ऽभिः । य॒ज्ञम् । अ॒श्रे॒त् ॥

Mantra without Swara
प्र ते अग्ने हविष्मतीमियर्म्यच्छा सुद्युम्नां रातिनीं घृताचीम्। प्रदक्षिणिद्देवतातिमुराणः सं रातिभिर्वसुभिर्यज्ञमश्रेत्॥

प्र। ते। अग्ने। हविष्मतीम्। इयर्मि। अच्छ। सुऽद्युम्नाम्। रातिनीम्। घृताचीम्। प्रऽदक्षिणित्। देवतातिम्। उराणः। सम्। रातिऽभिः। वसुऽभिः। यज्ञम्। अश्रेत्॥

Ashtak » 3 Adhyay » 1 Varga » 19 Mantra » 2

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1 Bhashyas
Meaning
हे (अग्ने) अग्नि के सदृश तेजधारी विद्वान् पुरुष ! मैं (ते) आपकी शिक्षा से जैसे (उराणः) विद्वानों को आदर से श्रेष्ठकर्त्ता कोई (प्रदक्षिणित्) दक्षिण अर्थात् सन्मार्गगन्ता जन (वसुभिः) निवास के कारण (रातिभिः) सुखदान आदि के साथ (हविष्मतीम्) अतिशय हवन सामग्रीयुक्त (सुद्युम्नाम्) श्रेष्ठ प्रकाश से युक्त (रातिनीम्) दिये हुए हवन के पदार्थों से युक्त (देवतातिम्) उत्तमस्वरूपविशिष्ट (घृताचीम्) जल को प्राप्त होनेवाली रात्रि और (यज्ञम्) शयनावस्था आदि में प्राप्त चित्त के व्यवहारों को (समश्रेत्) प्राप्त करे वैसे इसको (अच्छ) उत्तम रीति से (प्र) (इयर्मि) प्राप्त होता हूँ ॥२॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। मनुष्यों को चाहिये कि दिन में शयन छोड़ सांसारिक व्यवहार की सिद्धि के लिये परिश्रम कर रात्रि के समय स्वस्थतापूर्वक पञ्चदश १५ घटिका पर्यन्त निद्रालु होवें और दिन भर पुरुषार्थ से धन आदि उत्तम पदार्थों को प्राप्त होकर सुपात्र पुरुष तथा सन्मार्ग में दान देवें ॥२॥
Subject
फिर मनुष्यों को क्या करना चाहिये, इस विषय को अगले मन्त्र में कहा है।