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Rigveda Mandal 3 / Sukta 19 / Mantra 1

62 Sukta
5 Mantra
3/19/1
Devata- अग्निः Rishi- गाथी कौशिकः Chhanda- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
अ॒ग्निं होता॑रं॒ प्र वृ॑णे मि॒येधे॒ गृत्सं॑ क॒विं वि॑श्व॒विद॒ममू॑रम्। स नो॑ यक्षद्दे॒वता॑ता॒ यजी॑यान्रा॒ये वाजा॑य वनते म॒घानि॑॥

अ॒ग्निम् । होता॑रम् । प्र । वृ॒णे॒ । मि॒येधे॑ । गृत्स॑म् । क॒विम् । वि॒श्व॒ऽविद॑म् । अमू॑रम् । सः । नः॒ । य॒क्ष॒त् । दे॒वऽता॑ता । यजी॑यान् । रा॒ये । वाजा॑य । व॒न॒ते॒ । म॒घानि॑ ॥

Mantra without Swara
अग्निं होतारं प्र वृणे मियेधे गृत्सं कविं विश्वविदममूरम्। स नो यक्षद्देवताता यजीयान्राये वाजाय वनते मघानि॥

अग्निम्। होतारम्। प्र। वृणे। मियेधे। गृत्सम्। कविम्। विश्वऽविदम्। अमूरम्। सः। नः। यक्षत्। देवऽताता। यजीयान्। राये। वाजाय। वनते। मघानि॥

Ashtak » 3 Adhyay » 1 Varga » 19 Mantra » 1

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1 Bhashyas
Meaning
हे विद्वान् पुरुष ! मैं जिस (मियेधे) घृतादि के प्रक्षेपण से होने योग्य यज्ञ में (होतारम्) हवनकर्ता वा दाता (विश्वविदम्) सकल शास्त्रों के वेत्ता (अमूरम्) मूढता आदि दोषरहित (कविम्) तीक्ष्ण बुद्धियुक्त वा बहुत शास्त्रों के अध्यापक (गृत्सम्) शिक्षा देने में चतुर बुद्धिमान् और (अग्निम्) अग्नि के सदृश तेजस्वी पुरुष को (प्र) (वृणे) स्वीकार करता हूँ (सः) वह (यजीयान्) अत्यन्त यज्ञकर्त्ता आप (वाजाय) ज्ञानदाता और (वनते) प्रसन्नता से दिये पदार्थों के स्वीकारकर्त्ता पुरुष के लिये तथा (राये) धनप्राप्ति के लिये (मघानि) आदर करने योग्य धन और (देवताता) विद्वानों को (नः) हम लोगों के लिये (यक्षत्) संयुक्त कीजिये ॥१॥
Essence
मनुष्यों को चाहिये कि जिस अधिकार में जिस पुरुष की योग्यता हो, उसी ही के लिये वह अधिकार देवें, क्योंकि ऐसा करने पर धनधान्यरूप ऐश्वर्य्य की वृद्धि हो सकती है ॥१॥
Subject
अब इस तृतीय मण्डल में १९ उन्नीसवें सूक्त का प्रारम्भ है। उसके प्रथम मन्त्र में मनुष्यों का धनादि ऐश्वर्य्य कैसे बढ़े, इस विषय को अगले मन्त्र में कहा है।