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Rigveda Mandal 3 / Sukta 18 / Mantra 5

62 Sukta
5 Mantra
3/18/5
Devata- अग्निः Rishi- कतो वैश्वामित्रः Chhanda- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
कृ॒धि रत्नं॑ सुसनित॒र्धना॑नां॒ स घेद॑ग्ने भवसि॒ यत्समि॑द्धः। स्तो॒तुर्दु॑रो॒णे सु॒भग॑स्य रे॒वत्सृ॒प्रा क॒रस्ना॑ दधिषे॒ वपूं॑षि॥

कृ॒धि । रत्न॑म् । सु॒ऽस॒नि॒तः॒ । धना॑नाम् । सः । घ॒ । इत् । अ॒ग्ने॒ । भ॒व॒सि॒ । यत् । समि॑द्धः । स्तो॒तुः । दु॒रो॒णे । सु॒ऽभग॑स्य । रे॒वत् । सृ॒प्रा । क॒रस्ना॑ । द॒धि॒षे॒ । वपूं॑षि ॥

Mantra without Swara
कृधि रत्नं सुसनितर्धनानां स घेदग्ने भवसि यत्समिद्धः। स्तोतुर्दुरोणे सुभगस्य रेवत्सृप्रा करस्ना दधिषे वपूंषि॥

कृधि। रत्नम्। सुऽसनितः। धनानाम्। सः। घ। इत्। अग्ने। भवसि। यत्। समिद्धः। स्तोतुः। दुरोणे। सुऽभगस्य। रेवत्। सृप्रा। करस्ना। दधिषे। वपूंषि॥

Ashtak » 3 Adhyay » 1 Varga » 18 Mantra » 5

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1 Bhashyas
Meaning
हे (सुसनितः) उत्तम प्रकार दानविभागकारी (अग्ने) बिजुली के समान शीघ्र धनवृद्धिकर्त्ता ! (यत्) जो आप (समिद्धः) प्रकाशमान अग्नि के सदृश प्रकाशमान होते (सः, घ) सो ही (धनानाम्) सुवर्ण आदि रूप धनों में (रत्नम्) उत्तम धन को (कृधि) संयुक्त कीजिये (सुभगस्य) उत्तम ऐश्वर्य्य और (स्तोतुः) हवनकर्त्ता वा प्रशंसाकर्त्ता के (इत्) समान (दुरोणे) गृह में जो (सृप्रा) अभीष्टस्थान की प्राप्तिकारक (करस्ना) कर्मों की शुद्धिकारक आपके बाहुओं और (रेवत्) उत्तमधनयुक्त (वपूंषि) रूपवत् शरीरों को (दधिषे) धारण करते हो वह आप हम लोगों से आदर करने योग्य हो ॥५॥
Essence
इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। हे विद्वानो ! आप लोगों को चाहिये कि मनुष्यों को उत्तम प्रकार शिक्षा तथा पुरुषार्थ से युक्त और विद्या धनयुक्त करके उत्तम सभ्य चिरञ्जीवी जन बनाइये ॥५॥ इस सूक्त में विद्वान् और अग्नि के गुणों का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की पूर्व सूक्तार्थ के साथ संगति जाननी चाहिये ॥ यह अठारहवाँ सूक्त और अठारहवाँ वर्ग समाप्त हुआ ॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है।