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Rigveda Mandal 3 / Sukta 18 / Mantra 1

62 Sukta
5 Mantra
3/18/1
Devata- अग्निः Rishi- कतो वैश्वामित्रः Chhanda- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
भवा॑ नो अग्ने सु॒मना॒ उपे॑तौ॒ सखे॑व॒ सख्ये॑ पि॒तरे॑व सा॒धुः। पु॒रु॒द्रुहो॒ हि क्षि॒तयो॒ जना॑नां॒ प्रति॑ प्रती॒चीर्द॑हता॒दरा॑तीः॥

भव॑ । नः॒ । अ॒ग्ने॒ । सु॒ऽमनाः॑ । उप॑ऽइतौ । सखा॑ऽइव । सख्ये॑ । पि॒तराऽइव । सा॒धुः । पु॒रु॒ऽद्रुहः॑ । हि । क्षि॒तयः॑ । जना॑नाम् । प्रति॑ । प्र॒ती॒चीः । द॒ह॒ता॒त् । अरा॑तीः ॥

Mantra without Swara
भवा नो अग्ने सुमना उपेतौ सखेव सख्ये पितरेव साधुः। पुरुद्रुहो हि क्षितयो जनानां प्रति प्रतीचीर्दहतादरातीः॥

भव। नः। अग्ने। सुऽमनाः। उपऽइतौ। सखाऽइव। सख्ये। पितराऽइव। साधुः। पुरुऽद्रुहः। हि। क्षितयः। जनानाम्। प्रति। प्रतीचीः। दहतात्। अरातीः॥

Ashtak » 3 Adhyay » 1 Varga » 18 Mantra » 1

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1 Bhashyas
Meaning
हे (अग्ने) कृपारूप विद्वान् पुरुष ! आप (उपेतौ) प्राप्ति में (पितरेव) जनकों के सदृश (सख्ये) मित्र कर्म के लिये (सखेव) मित्र के तुल्य (नः) हम लोगों के लिये (सुमनाः) उत्तम मनयुक्त (भव) होइये और (साधुः) उत्तम उपदेश से कल्याणकारी होकर (जनानाम्) मनुष्यों के बीच में जो (क्षितयः) मनुष्य, (पुरुद्रुहः) बहुत लोगों से द्वेषकर्त्ता होवें उन (प्रतीचीः) प्रतिकूल वर्त्तमान (अरातीः) शत्रुओं को (प्रति) (दहतात्) भस्म करिये ॥१॥
Essence
इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। हे मनुष्यो आप लोगों को चाहिये कि जो विद्वान् लोग मनुष्य आदि प्राणियों में पिता और मित्र के तुल्य वर्त्तावकारी उनका सत्कार और जो द्वेषकारी उनका निरादर करके धर्मवृद्धि करें ॥१॥
Subject
अब इस तृतीय मण्डल में अठारहवें सूक्त का आरम्भ है। उसके पहिले मन्त्र से विद्वानों को क्या करना योग्य है, इस विषय को अगले मन्त्र में कहा है।