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Rigveda Mandal 3 / Sukta 17 / Mantra 5

62 Sukta
5 Mantra
3/17/5
Devata- अग्निः Rishi- कतो वैश्वामित्रः Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
यस्त्वद्धोता॒ पूर्वो॑ अग्ने॒ यजी॑यान्द्वि॒ता च॒ सत्ता॑ स्व॒धया॑ च शं॒भुः। तस्यानु॒ धर्म॒ प्र य॑जा चिकि॒त्वोऽथा॑ नो धा अध्व॒रं दे॒ववी॑तौ॥

यः । त्वत् । होता॑ । पूर्वः॑ । अ॒ग्ने॒ । यजी॑यान् । द्वि॒ता । च॒ । सत्ता॑ । स्व॒धया॑ । च॒ । श॒म्ऽभुः । तस्य॑ । अनु॑ । धर्म॑ । प्र । य॒ज॒ । चि॒कि॒त्वः॒ । अथ॑ । नः॒ । धाः॒ । अ॒ध्व॒रम् । दे॒वऽवी॑तौ ॥

Mantra without Swara
यस्त्वद्धोता पूर्वो अग्ने यजीयान्द्विता च सत्ता स्वधया च शंभुः। तस्यानु धर्म प्र यजा चिकित्वोऽथा नो धा अध्वरं देववीतौ॥

यः। त्वत्। होता। पूर्वः। अग्ने। यजीयान्। द्विता। च। सत्ता। स्वधया। च। शम्ऽभुः। तस्य। अनु। धर्म। प्र। यज। चिकित्वः। अथ। नः। धाः। अध्वरम्। देवऽवीतौ॥

Ashtak » 3 Adhyay » 1 Varga » 17 Mantra » 5

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1 Bhashyas
Meaning
हे (अग्ने) विद्वान् पुरुष ! जो (त्वत्) आपके समीप से (होता) दानशील (पूर्वः) पूर्ण विद्यावान् (यजीयान्) अतिशय यज्ञकारक वा संमेलकारी (द्विता) द्वित्व स्वरूप (च) और (सत्ता) स्थित (स्वधया) अन्न से (च) भी (शम्भुः) सुखकारक होवे (तस्य) उसके (धर्म) धारण करने योग्य को (अनु) (प्र) (यज) सम्प्राप्त होइये (अथ) इसके अनन्तर हे (चिकित्वः) विज्ञानशाली ! आप (देववीतौ) विद्वानों के समूह में (नः) हम लोगों के (अध्वरम्) अहिंसा आदि गुणयुक्त व्यवहार को (धाः) धारण करिये ॥५॥
Essence
हे मनुष्यो ! जो विद्वान् लोग आप लोगों की अपेक्षा प्राचीन तथा अन्न आदि सामग्रियों से अहिंसाख्य व्यवहार को धारण किया करें, इससे वे सर्वदा सुखभोगी हों ॥५॥ इस सूक्त में अग्नि और विद्वान् के गुणों का वर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की पिछले सूक्त के अर्थ के साथ संगति है, ऐसा जानना चाहिये ॥ यह सत्रहवाँ सूक्त और सत्रहवाँ वर्ग समाप्त हुआ ॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है।