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Rigveda Mandal 3 / Sukta 17 / Mantra 1

62 Sukta
5 Mantra
3/17/1
Devata- अग्निः Rishi- कतो वैश्वामित्रः Chhanda- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
स॒मि॒ध्यमा॑नः प्रथ॒मानु॒ धर्मा॒ समु॒क्तभि॑रज्यते वि॒श्ववा॑रः। शो॒चिष्के॑शो घृ॒तनि॑र्णिक्पाव॒कः सु॑य॒ज्ञो अ॒ग्निर्य॒जथा॑य दे॒वान्॥

स॒म्ऽइ॒ध्यमा॑नः । प्र॒थ॒मा । अनु॑ । धर्म॑ । सम् । अ॒क्तुऽभिः॑ । अ॒ज्य॒ते॒ । वि॒श्वऽवा॑रः । शो॒चिःऽके॑शः । घृ॒तऽनि॑र्निक् । पा॒व॒कः । सु॒ऽय॒ज्ञः । अ॒ग्निः । य॒जथा॑य । दे॒वान् ॥

Mantra without Swara
समिध्यमानः प्रथमानु धर्मा समुक्तभिरज्यते विश्ववारः। शोचिष्केशो घृतनिर्णिक्पावकः सुयज्ञो अग्निर्यजथाय देवान्॥

सम्ऽइध्यमानः। प्रथमा। अनु। धर्म। सम्। अक्तुऽभिः। अज्यते। विश्वऽवारः। शोचिःऽकेशः। घृतऽनिर्निक्। पावकः। सुऽयज्ञः। अग्निः। यजथाय। देवान्॥

Ashtak » 3 Adhyay » 1 Varga » 17 Mantra » 1

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1 Bhashyas
Meaning
हे मनुष्यो ! जो (समिध्यमानः) उत्तम प्रकार प्रकाशमान (विश्ववारः) सकल जन का प्रिय (शोचिष्केशः) तेजरूप केशवान् (घृतनिर्णिक्) तेजस्वी (पावकः) पवित्रकर्त्ता (सुयज्ञः) सुन्दर यज्ञ जिससे हों वह अग्नि (समक्तुभिः) उत्तम रात्रियों से (यजथाय) सङ्ग के लिये (प्रथमा) प्रसिद्ध (धर्म) धर्मों को (अज्यते) उत्तम प्रकार प्रसिद्ध करता तथा (देवान्) उत्तम गुणों का (अनु) प्रस्तार करता है, उसको अच्छे प्रकार प्रेरणा करो ॥१॥
Essence
जो अति गुणों से युक्त अग्नि आदि पदार्थ से कार्य्यों को सिद्ध करें, तो सम्पूर्ण कार्य्य मनुष्य सिद्ध कर सकते हैं ॥१॥
Subject
अब पाँच ऋचावाले सत्रहवें सूक्त का आरम्भ है। उसके प्रथम मन्त्र में अग्नि के गुणों को कहते हैं।