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Rigveda Mandal 3 / Sukta 16 / Mantra 6

62 Sukta
6 Mantra
3/16/6
Devata- अग्निः Rishi- उत्कीलः कात्यः Chhanda- निचृत्पङ्क्ति Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
श॒ग्धि वाज॑स्य सुभग प्र॒जाव॒तोऽग्ने॑ बृह॒तो अ॑ध्व॒रे। सं रा॒या भूय॑सा सृज मयो॒भुना॒ तुवि॑द्युम्न॒ यश॑स्वता॥

श॒ग्धि । वाज॑स्य । सु॒ऽभ॒ग॒ । प्र॒जाऽव॑तः । अग्ने॑ । बृ॒ह॒तः । अ॒ध्व॒रे । सम् । रा॒या । भूय॑सा । सृ॒ज॒ । म॒यः॒ऽभुना॑ । तुवि॑ऽद्युम्न । यश॑स्वता ॥

Mantra without Swara
शग्धि वाजस्य सुभग प्रजावतोऽग्ने बृहतो अध्वरे। सं राया भूयसा सृज मयोभुना तुविद्युम्न यशस्वता॥

शग्धि। वाजस्य। सुऽभग। प्रजाऽवतः। अग्ने। बृहतः। अध्वरे। सम्। राया। भूयसा। सृज। मयःऽभुना। तुविऽद्युम्न। यशस्वता॥

Ashtak » 3 Adhyay » 1 Varga » 16 Mantra » 6

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1 Bhashyas
Meaning
हे (तुविद्युम्न) बहुत धन और कीर्त्ति से युक्त (सुभग) उत्तम ऐश्वर्य्यधारी (अग्ने) विद्वान् पुरुष ! आप (प्रजावतः) प्रशंसा करने योग्य प्रजायुक्त (बृहतः) श्रेष्ठ (वाजस्य) अन्न आदि वा विज्ञान के (अध्वरे) अहिंसा आदि स्वरूप व्यवहार में (शग्धि) सामर्थ्य स्वरूप हो उस (भूयसा) बड़े (मयोभुना) सुखकारक (यशस्वता) अधिक यश सहित (राया) धन से हमको (संसृज) संयुक्त कीजिये ॥६॥
Essence
मनुष्यों को चाहिये कि विद्वानों के सङ्ग से यह प्रार्थना करें कि हे विद्वानों ! हम लोगों को विद्या विनय और धन सुखों से संयुक्त करो ॥६॥ इस सूक्त में अग्नि और विद्वानों के गुणों के वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की पिछले सूक्त के अर्थ के साथ संगति है, यह जानना चाहिये ॥ यह सोलहवाँ सूक्त और सोलहवाँ वर्ग समाप्त हुआ ॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है।