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Rigveda Mandal 3 / Sukta 16 / Mantra 4

62 Sukta
6 Mantra
3/16/4
Devata- अग्निः Rishi- उत्कीलः कात्यः Chhanda- भुरिक्बृहती Swara- मध्यमः
Mantra with Swara
चक्रि॒र्यो विश्वा॒ भुव॑ना॒भि सा॑स॒हिश्चक्रि॑र्दे॒वेष्वा दुवः॑। आ दे॒वेषु॒ यत॑त॒ आ सु॒वीर्य॒ आ शंस॑ उ॒त नृ॒णाम्॥

चक्रिः॑ । यः । विश्वा॑ । भुव॑ना । अ॒भि । स॒स॒हिः । चक्रिः॑ । दे॒वेषु॑ । आ । दुवः॑ । आ । दे॒वेषु॑ । यत॑ते । आ । सु॒ऽवीर्ये॑ । आ । शंसे॑ । उ॒त । नृ॒णाम् ॥

Mantra without Swara
चक्रिर्यो विश्वा भुवनाभि सासहिश्चक्रिर्देवेष्वा दुवः। आ देवेषु यतत आ सुवीर्य आ शंस उत नृणाम्॥

चक्रिः। यः। विश्वा। भुवना। अभि। ससहिः। चक्रिः। देवेषु। आ। दुवः। आ। देवेषु। यतते। आ। सुऽवीर्ये। आ। शंसे। उत। नृणाम्॥

Ashtak » 3 Adhyay » 1 Varga » 16 Mantra » 4

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1 Bhashyas
Meaning
हे मनुष्यो ! (यः) जो (विश्वा) सम्पूर्ण (भुवना) लोकों का (अभि, चक्रिः) अभिमुख कर्ता (देवेषु) उत्तम गुणों में (सासहिः) अतिसहनशील और (दुवः) सेवन को (आ, चक्रिः) अच्छे प्रकार करनेवाला और जो (देवेषु) स्तुतिकारकों में (आ) (यतते) अच्छा यत्न करता है (उत) और भी (नृणाम्) वीरपुरुषों की (आ) (शंसे) स्तुति में (सुवीर्य्ये) श्रेष्ठ बल में (आ) सब प्रकार प्रयत्न करता है, उसकी सदा (सेवध्वम्) सेवा करो ॥४॥
Essence
हे मनुष्यो ! जिसने सम्पूर्ण लोक तथा मनुष्य आदि प्राणी रचे और उन प्राणियों के जीवनार्थ अन्न आदि पदार्थ रचे और जो विद्वानों से जानने योग्य उस ही परमात्मा का निरन्तर सेवन करना चाहिये ॥४॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है।