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Rigveda Mandal 3 / Sukta 15 / Mantra 2

62 Sukta
7 Mantra
3/15/2
Devata- अग्निः Rishi- उत्कीलः कात्यः Chhanda- पङ्क्तिः Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
त्वं नो॑ अ॒स्या उ॒षसो॒ व्यु॑ष्टौ॒ त्वं सूर॒ उदि॑ते बोधि गो॒पाः। जन्मे॑व॒ नित्यं॒ तन॑यं जुषस्व॒ स्तोमं॑ मे अग्ने त॒न्वा॑ सुजात॥

त्वम् । नः॒ । अ॒स्याः । उ॒षसः॑ । विऽउ॑ष्टौ । त्वम् । सूरे॑ । उत्ऽइ॑ते । बो॒धि॒ । गो॒पाः । जन्म॑ऽइव । नित्य॑म् । तन॑यम् । जु॒ष॒स्व॒ । स्तोम॑म् । मे॒ । अ॒ग्ने॒ । त॒न्वा॑ । सु॒ऽजा॒त॒ ॥

Mantra without Swara
त्वं नो अस्या उषसो व्युष्टौ त्वं सूर उदिते बोधि गोपाः। जन्मेव नित्यं तनयं जुषस्व स्तोमं मे अग्ने तन्वा सुजात॥

त्वम्। नः। अस्याः। उषसः। विऽउष्टौ। त्वम्। सूरे। उत्ऽइते। बोधि। गोपाः। जन्मऽइव। नित्यम्। तनयम्। जुषस्व। स्तोमम्। मे। अग्ने। तन्वा। सुऽजात॥

Ashtak » 3 Adhyay » 1 Varga » 15 Mantra » 2

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1 Bhashyas
Meaning
हे (सुजात) उत्तम प्रकार प्रसिद्ध (अग्ने) अग्नि के सदृश तेजस्वी (गोपाः) रक्षाकारक विद्वान् पुरुष ! (त्वम्) आप (अस्याः) इस (उषसः) प्रभात समय के (व्युष्टौ) अतिप्रकाश होने पर (नः) हम लोगों को (बोधि) जगाइये (त्वम्) आप (सूरे) सूर्य्य के (उदिते) उदय को प्राप्त होने पर हमको जगाइये (नित्यम्) अतिकाल प्राणधारी (तनयम्) पुत्र को (जन्मेव) जैसे प्रारब्ध कर्म प्रकट करता है, वैसे (मे) मेरे (तन्वा) शरीर से (स्तोमम्) विद्या सम्बन्धिनी प्रशंसा को (जुषस्व) आदर कीजिये वा ग्रहण कीजिये ॥२॥
Essence
इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जैसे गर्भाशय में वर्त्तमान पुरुष गर्भों के स्वरूप को नहीं जानते हैं, वैसे ही निद्रावस्थापन्न और अविद्या में लिप्त पुरुष विज्ञान से रहित होते हैं और जैसे जन्मधारण होने के अनन्तर शरीरसहित जीवात्मा प्रकट होता है, वैसे ही निद्रा को त्याग के प्रातःकाल में जागृत पुरुषों के सदृश अविद्या को त्याग के विद्या में कुशल जन प्रशंसनीय होते हैं ॥२॥
Subject
फिर मनुष्य क्या करें, इस विषय को अगले मन्त्र में कहा है।