Available Bhashyas

Bhashyas

Choose the bhashyas to show on this mantra page.

Rigveda Mandal 3 / Sukta 14 / Mantra 7

62 Sukta
7 Mantra
3/14/7
Devata- अग्निः Rishi- ऋषभो वैश्वामित्रः Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
तुभ्यं॑ दक्ष कविक्रतो॒ यानी॒मा देव॒ मर्ता॑सो अध्व॒रे अक॑र्म। त्वं विश्व॑स्य सु॒रथ॑स्य बोधि॒ सर्वं॒ तद॑ग्ने अमृत स्वदे॒ह॥

तुभ्य॑म् । द॒क्ष॒ । क॒वि॒क्र॒तो॒ इति॑ कविऽक्रतो । यानि॑ । इ॒मा । देव॑ । मर्ता॑सः । अ॒ध्व॒रे । अक॑र्म । त्वम् । विश्व॑स्य । सु॒ऽरथ॑स्य । बो॒धि॒ । सर्व॑म् । तत् । अ॒ग्ने॒ । अ॒मृ॒त॒ । स्व॒द॒ । इ॒ह ॥

Mantra without Swara
तुभ्यं दक्ष कविक्रतो यानीमा देव मर्तासो अध्वरे अकर्म। त्वं विश्वस्य सुरथस्य बोधि सर्वं तदग्ने अमृत स्वदेह॥

तुभ्यम्। दक्ष। कविक्रतो इति कविऽक्रतो। यानि। इमा। देव। मर्तासः। अध्वरे। अकर्म। त्वम्। विश्वस्य। सुऽरथस्य। बोधि। सर्वम्। तत्। अग्ने। अमृत। स्वद। इह॥

Ashtak » 3 Adhyay » 1 Varga » 14 Mantra » 7

Bhashya

More bhashyas
Meaning
हे (दक्ष) अत्यन्त चतुर (कविक्रतो) पण्डितों के तुल्य बुद्धिमान् (देव) श्रेष्ठ गुण कर्म स्वभावों के देनेवाले (अमृत) अपने स्वरूप से नाशरहित (अग्ने) विद्वान् पुरुष ! (मर्त्तासः) हम मनुष्य लोग (अध्वरे) अहिंसा आदि रूप धर्म में (तुभ्यम्) आपके लिये (यानि) जो (इमा) ये धर्मसम्बन्धी कर्म उनको (इह) इस संसार में (अकर्म) करें (तत्) उस (सर्वम्) संपूर्ण कर्म को (त्वम्) आप (विश्वस्य) सम्पूर्ण (सुरथस्य) उत्तम रथ आदि अङ्गों से युक्त विद्याप्रकाशकारक व्यवहार के बीच (बोधि) जानिये और उत्तम प्रकार पाक से सिद्ध किये हुए अन्नों का (स्वद) स्वादपूर्वक भोग करें ॥७॥
Essence
सम्पूर्ण मनुष्यों को चाहिये कि जैसे विद्वान् लोग धर्मयोग्य कर्म करें, वैसे वे भी करें और सम्पूर्ण जन एक सम्मति करके इस संसार में विद्या और सुख की उन्नति करें ॥७॥ इस सूक्त में अग्नि और विद्वानों के गुणों का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की पिछले सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति है, यह समझनी चाहिये ॥ यह चौदहवाँ सूक्त और चौदहवाँ वर्ग समाप्त हुआ ॥
Subject
अब विद्वानों के तुल्य अन्य लोग आचरण करें, इस विषय को अगले मन्त्र में कहा है।

We are thankful to https://vedicscriptures.in for providing us a substantial amount of data for this section of the Vedas.