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Rigveda Mandal 3 / Sukta 14 / Mantra 5

62 Sukta
7 Mantra
3/14/5
Devata- अग्निः Rishi- ऋषभो वैश्वामित्रः Chhanda- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
व॒यं ते॑ अ॒द्य र॑रि॒मा हि काम॑मुत्ता॒नह॑स्ता॒ नम॑सोप॒सद्य॑। यजि॑ष्ठेन॒ मन॑सा यक्षि दे॒वानस्रे॑धता॒ मन्म॑ना॒ विप्रो॑ अग्ने॥

व॒यम् । ते॒ । अ॒द्य । र॒रि॒म॒ । हि । काम॑म् । उ॒त्ता॒नऽह॑स्ताः । नम॑सा । उ॒प॒ऽसद्य॑ । यजि॑ष्ठेन । मन॑सा । य॒क्षि॒ । दे॒वान् । अस्रे॑धता । मन्म॑ना । विप्रः॑ । अ॒ग्ने॒ ॥

Mantra without Swara
वयं ते अद्य ररिमा हि काममुत्तानहस्ता नमसोपसद्य। यजिष्ठेन मनसा यक्षि देवानस्रेधता मन्मना विप्रो अग्ने॥

वयम्। ते। अद्य। ररिम। हि। कामम्। उत्तानऽहस्ताः। नमसा। उपऽसद्य। यजिष्ठेन। मनसा। यक्षि। देवान्। अस्रेधता। मन्मना। विप्रः। अग्ने॥

Ashtak » 3 Adhyay » 1 Varga » 14 Mantra » 5

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Meaning
हे (अग्ने) विद्वान् पुरुष ! (हि) जिससे (विप्रः) बुद्धिमान् आप (यजिष्ठेन) अत्यन्त संलग्न और (अस्रेधता) नहीं खिन्न हुए (मन्मना) विज्ञान से युक्त (मनसा) चित्त से हम (देवान्) विद्वानों का (यक्षि) सङ्ग कीजिये उससे (अद्य) इस समय (उत्तानहस्ताः) हाथ उठाये हुए (वयम्) हम लोग आपको (नमसा) सत्कार से वा अन्न आदि से (उप, सद्य) समीप प्राप्त हो के (ते) आपके (कामम्) मनोरथ को (ररिम) देवें ॥५॥
Essence
जैसे अध्यापक लोग शिष्यों की विद्याविषयिणी इच्छा को सन्तृप्त करते हैं, वैसे ही विद्यार्थी जन भी अध्यापकों के मनोरथों को सफल करें और सब काल में संपूर्ण पुरुष विद्या आदि शुभगुणों के देनेवाले होवें ॥५॥
Subject
फिर अध्यापक और अध्येता के विषय को अगले मन्त्र में कहा है।

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