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Rigveda Mandal 3 / Sukta 13 / Mantra 5

62 Sukta
7 Mantra
3/13/5
Devata- अग्निः Rishi- ऋषभो वैश्वामित्रः Chhanda- निचृदनुष्टुप् Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
दी॒दि॒वांस॒मपू॑र्व्यं॒ वस्वी॑भिरस्य धी॒तिभिः॑। ऋक्वा॑णो अ॒ग्निमि॑न्धते॒ होता॑रं वि॒श्पतिं॑ वि॒शाम्॥

दी॒दि॒ऽवांस॑म् । अपू॑र्व्यम् । वस्वी॑भिः । अ॒स्य॒ । धी॒तिऽभिः॑ । ऋक्वा॑णः । अ॒ग्निम् । इ॒न्ध॒ते॒ । होता॑रम् । वि॒श्पति॑म् । वि॒शाम् ॥

Mantra without Swara
दीदिवांसमपूर्व्यं वस्वीभिरस्य धीतिभिः। ऋक्वाणो अग्निमिन्धते होतारं विश्पतिं विशाम्॥

दीदिऽवांसम्। अपूर्व्यम्। वस्वीभिः। अस्य। धीतिऽभिः। ऋक्वाणः। अग्निम्। इन्धते। होतारम्। विश्पतिम्। विशाम्॥

Ashtak » 3 Adhyay » 1 Varga » 13 Mantra » 5

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Meaning
हे मनुष्यो ! जो पुरुष (ऋक्वाणः) स्तुति करने योग्य गुणों के स्तुतिकर्त्ता (धीतिभिः) अङ्गुलियों के सदृश (वस्वीभिः) धन प्राप्त करानेवाली क्रियाओं से (अस्य) इस संसार के मध्य में (अग्निम्) अग्नि के तुल्य वर्त्तमान (दीदिवांसम्) उत्तम गुणों के प्रकाश से युक्त (अपूर्व्यम्) अपूर्व श्रेष्ठ गुणों में निपुण (होतारम्) सुखदायक (विशाम्) प्रजाओं के बीच (विश्पतिम्) विशिष्टों के पालनकर्त्ता जन को (इन्धते) प्रकाशित करता है, उसकी आप लोग सेवा करें ॥५॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे मनुष्यो ! आप लोगों को इस संसार में श्रेष्ठ पुरुषों का आश्रय करना, दुष्टों का सङ्ग त्यागना, विद्या धन की वृद्धि करनी और विद्या विनय से युक्त राजा का सेवन करना योग्य है, ऐसा समझो ॥५॥
Subject
फिर मनुष्य क्या करें, इस विषय को अगले मन्त्र में कहा है।

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