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Rigveda Mandal 3 / Sukta 13 / Mantra 4

62 Sukta
7 Mantra
3/13/4
Devata- अग्निः Rishi- ऋषभो वैश्वामित्रः Chhanda- विराडनुष्टुप् Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
स नः॒ शर्मा॑णि वी॒तये॒ऽग्निर्य॑च्छतु॒ शंत॑मा। यतो॑ नः प्रु॒ष्णव॒द्वसु॑ दि॒वि क्षि॒तिभ्यो॑ अ॒प्स्वा॥

सः । नः॒ । शर्मा॑णि । वी॒तये॑ । अ॒ग्निः । य॒च्छ॒तु॒ । शम्ऽत॑मा । यतः॑ । नः॒ । प्रु॒ष्णव॑त् । वसु॑ । दि॒वि । क्षि॒तिऽभ्यः॑ । अ॒प्ऽसु । आ ॥

Mantra without Swara
स नः शर्माणि वीतयेऽग्निर्यच्छतु शंतमा। यतो नः प्रुष्णवद्वसु दिवि क्षितिभ्यो अप्स्वा॥

सः। नः। शर्माणि। वीतये। अग्निः। यच्छतु। शम्ऽतमा। यतः। नः। प्रुष्णवत्। वसु। दिवि। क्षितिऽभ्यः। अप्ऽसु। आ॥

Ashtak » 3 Adhyay » 1 Varga » 13 Mantra » 4

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1 Bhashyas
Meaning
(सः) वह पूर्वमन्त्र में कहा हुआ विद्वान् (अग्निः) अग्नि के सदृश (वीतये) विज्ञान आदि धन की प्राप्ति के लिये (नः) हम लोगों को (शन्तमा) अतिशय कल्याणकारक (शर्माणि) उत्तम गृहों को (क्षितिभ्यः) पृथ्वी में विराजमान देशों से (दिवि) प्रकाश में (अप्सु) प्राणों जलों वा अन्तरिक्ष में (आ) चारों ओर से (यच्छतु) देवे (यतः) जिससे (नः) हम लोगों को (प्रुष्णवत्) अच्छे ऐश्वर्ययुक्त जैसा (वसु) धन प्राप्त होवे ॥४॥
Essence
गृहस्थ लोगों को चाहिये कि सर्वदा सुखोत्पादक गृहों को निर्मित करके और जल स्थल अन्तरिक्ष मार्ग से गमन के लिये उत्तम वाहन तथा अन्य यन्त्रादि साधनों को रच कर सम्पूर्ण समृद्धियाँ सञ्चित करें, फिर उनसे अपना विज्ञान बढ़ावें ॥४॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है।