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Rigveda Mandal 3 / Sukta 13 / Mantra 2

62 Sukta
7 Mantra
3/13/2
Devata- अग्निः Rishi- ऋषभो वैश्वामित्रः Chhanda- निचृदनुष्टुप् Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
ऋ॒तावा॒ यस्य॒ रोद॑सी॒ दक्षं॒ सच॑न्त ऊ॒तयः॑। ह॒विष्म॑न्त॒स्तमी॑ळते॒ तं स॑नि॒ष्यन्तोऽव॑से॥

ऋ॒तऽवा॑ । यस्य॑ । रोद॑सी॒ इति॑ । दक्ष॑म् । सच॑न्ते । ऊ॒तयः॑ । ह॒विष्म॑न्तः । तम् । ई॒ळ॒ते॒ । तम् । स॒नि॒ष्यन्तः॑ । अव॑से ॥

Mantra without Swara
ऋतावा यस्य रोदसी दक्षं सचन्त ऊतयः। हविष्मन्तस्तमीळते तं सनिष्यन्तोऽवसे॥

ऋतऽवा। यस्य। रोदसी इति। दक्षम्। सचन्ते। ऊतयः। हविष्मन्तः। तम्। ईळते। तम्। सनिष्यन्तः। अवसे॥

Ashtak » 3 Adhyay » 1 Varga » 13 Mantra » 2

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1 Bhashyas
Meaning
हे विद्वन् पुरुष ! (ऋतावा) सत्य की प्रार्थना करनेवाले आप (यस्य) जिसके (दक्षम्) पराक्रम वा चतुराई और (ऊतयः) रक्षा करनेवाले गुण (रोदसी) अन्तरिक्ष और पृथिवी को (सचन्ते) सम्बद्ध करते अर्थात् उनमें व्याप्त होते हैं (तम्) उसके (हविष्मन्तः) प्रशंसा करने योग्य दानयुक्त जन सम्बन्धी होते हैं (तम्) उसकी (अवसे) रक्षा आदि के लिये (सनिष्यन्तः) सेवन करनेवाले लोग (ईळते) प्रशंसा करते हैं, उसीकी प्रशंसा करो ॥२॥
Essence
हे मनुष्यो ! जिसकी कीर्त्ति आकाश और पृथिवी में व्याप्त, जिसके न्याय से प्रशस्त रक्षा आदि कर्म होते हैं, उसी विद्वान् सभापति की रक्षा आदि के लिये तुम आश्रय करो ॥२॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है।