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Rigveda Mandal 3 / Sukta 12 / Mantra 4

62 Sukta
9 Mantra
3/12/4
Devata- इन्द्राग्नी Rishi- गाथिनो विश्वामित्रः Chhanda- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
तो॒शा वृ॑त्र॒हणा॑ हुवे स॒जित्वा॒नाप॑राजिता। इ॒न्द्रा॒ग्नी वा॑ज॒सात॑मा॥

तो॒शा । वृ॒त्र॒ऽहना॑ । हु॒वे॒ । स॒ऽजित्य्वा॑ना । अप॑राऽजिता । इ॒न्द्रा॒ग्नी इति॑ । वा॒ज॒ऽसात॑मा ॥

Mantra without Swara
तोशा वृत्रहणा हुवे सजित्वानापराजिता। इन्द्राग्नी वाजसातमा॥

तोशा। वृत्रऽहना। हुवे। सऽजित्वाना। अपराऽजिता। इन्द्राग्नी इति। वाजऽसातमा॥

Ashtak » 3 Adhyay » 1 Varga » 11 Mantra » 4

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1 Bhashyas
Meaning
हे सभासेना के अध्यक्षो ! मैं (वृत्रहणा) असुर स्वभाववाले दुष्ट के नाशकारक (इन्द्राग्नी) सूर्य्य बिजुली के सदृश वर्त्तमान (तोशा) बढ़ानेवाले वा विज्ञानशील (सजित्वाना) जीतनेवाले वीरों के साथ वर्त्तमान (अपराजिता) शत्रुओं से नहीं हारने योग्य (वाजसातमा) विज्ञान वा धन का अतिशय विभाग करनेवाले आप लोगों की (हुवे) प्रशंसा करता हूँ ॥४॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो राजा लोग शत्रुओं के जीतने और शत्रुओं से नहीं हारनेवाले न्यायकर्ता पुरुषों का सन्मानपूर्वक स्वीकार करते हैं, उनका सर्वदा विजय होता है ॥४॥
Subject
अब राजधर्म विषय को अगले मन्त्र में कहा है।