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Rigveda Mandal 3 / Sukta 11 / Mantra 9

62 Sukta
9 Mantra
3/11/9
Devata- अग्निः Rishi- गाथिनो विश्वामित्रः Chhanda- विराड्गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
अग्ने॒ विश्वा॑नि॒ वार्या॒ वाजे॑षु सनिषामहे। त्वे दे॒वास॒ एरि॑रे॥

अग्ने॑ । विश्वा॑नि । वार्या॑ । वाजे॑षु । स॒नि॒षा॒म॒हे॒ । त्वे इति॑ । दे॒वासः । आ । ई॒रि॒रे॒ ॥

Mantra without Swara
अग्ने विश्वानि वार्या वाजेषु सनिषामहे। त्वे देवास एरिरे॥

अग्ने। विश्वानि। वार्या। वाजेषु। सनिषामहे। त्वे इति। देवासः। आ। ईरिरे॥

Ashtak » 3 Adhyay » 1 Varga » 10 Mantra » 4

Bhashya

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Meaning
हे (अग्ने) अग्नि के तुल्य विद्याओं से उत्तम प्रकार प्रकाशयुक्त विद्वन् पुरुष ! जिन (त्वे) आपके विषय में (देवासः) विद्वान् लोग हम लोगों को (आ) (ईरिरे) प्रेरणा करते हैं फिर प्रेरित हुए हम लोग (वाजेषु) सङ्ग्राम आदि व्यवहारों में (विश्वानि) सम्पूर्ण (वार्य्या) अच्छे प्रकार स्वीकार करने योग्य धनादि वस्तुओं को (सनिषामहे) यथाभाग प्राप्त होवें ॥९॥
Essence
हे मनुष्यो ! जिस धर्मयुक्त पुरुषार्थ में विद्वान् लोग तुमलोगों को प्रेरणा करें तो जैसे हम लोग उनकी आज्ञानुकूल वर्त्ताव करके विद्या और धन को प्राप्त होवें, वैसे ही उन पुरुषों की आज्ञानुसार वर्त्ताव करके आप लोग भी विद्या और धनयुक्त होइये ॥९॥ इस सूक्त में अग्नि और विद्वान् पुरुष के गुणों का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की पिछले सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति है, यह जानना चाहिये ॥ यह ग्यारहवाँ सूक्त और दशवाँ वर्ग समाप्त हुआ ॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है।

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