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Rigveda Mandal 3 / Sukta 11 / Mantra 5

62 Sukta
9 Mantra
3/11/5
Devata- अग्निः Rishi- गाथिनो विश्वामित्रः Chhanda- निचृद्गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
अदा॑भ्यः पुरए॒ता वि॒शाम॒ग्निर्मानु॑षीणाम्। तूर्णी॒ रथः॒ सदा॒ नवः॑॥

अदा॑भ्यः । पु॒रः॒ऽए॒ता । वि॒शाम् । अ॒ग्निः । मानु॑षीणाम् । तूर्णिः॑ । रथः॑ । सदा॑ । नवः॑ ॥

Mantra without Swara
अदाभ्यः पुरएता विशामग्निर्मानुषीणाम्। तूर्णी रथः सदा नवः॥

अदाभ्यः। पुरःऽएता। विशाम्। अग्निः। मानुषीणाम्। तूर्णिः। रथः। सदा। नवः॥

Ashtak » 3 Adhyay » 1 Varga » 9 Mantra » 5

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1 Bhashyas
Meaning
विद्वान् पुरुष (तूर्णिः) शीघ्र चलनेवाला और (नवः) नवीन (रथः) उत्तम सवारी और (अग्निः) अग्नि के सदृश प्रकाशित (मानुषीणाम्) मनुष्य संबन्धिनी (विशाम्) प्रजाओं की (सदा) सब काल में (अदाभ्यः) परस्पर हिंसा का वारणकर्ता और (पुरएता) अग्रगामी होवें ॥५॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। विद्वान् लोग जैसे शीघ्रगामी नवीन रथ से शीघ्र अपने वाञ्छित स्थान को कोई एक मनुष्य पहूँचता है, वैसे वैर को त्याग के सब लोगों को अपनी इच्छानुकूल सद्विद्याओं की शीघ्र शिक्षा देकर उनका जन्म सफल करें ॥५॥
Subject
फिर विद्वान् लोग क्या करें, इस विषय को अगले मन्त्र में कहा है।