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Rigveda Mandal 3 / Sukta 11 / Mantra 2

62 Sukta
9 Mantra
3/11/2
Devata- अग्निः Rishi- गाथिनो विश्वामित्रः Chhanda- निचृद्गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
स ह॑व्य॒वाळम॑र्त्य उ॒शिग्दू॒तश्चनो॑हितः। अ॒ग्निर्धि॒या समृ॑ण्वति॥

सः । ह॒व्य॒ऽवाट् । अम॑र्त्यः । उ॒शिक् । दू॒तः । चनः॑ऽहितः । अ॒ग्निः । धि॒या । सम् । ऋ॒ण्व॒ति॒ ॥

Mantra without Swara
स हव्यवाळमर्त्य उशिग्दूतश्चनोहितः। अग्निर्धिया समृण्वति॥

सः। हव्यऽवाट्। अमर्त्यः। उशिक्। दूतः। चनःऽहितः। अग्निः। धिया। सम्। ऋण्वति॥

Ashtak » 3 Adhyay » 1 Varga » 9 Mantra » 2

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1 Bhashyas
Meaning
जो पुरुष (अग्निः) अग्नि के तुल्य तेजस्वी (हव्यवाट्) ग्रहण करने योग्य हवनसामग्री को प्राप्त (अमर्त्यः) मरणरूप धर्म से रहित (उशिक्) कामना करता हुआ (दूतः) अविद्या आदि से पृथक् दूर विद्या को प्राप्त करानेवाला (चनोहितः) अन्नादिकों में वृद्धिरूप हितकर्म करनेवाला विद्वान् पुरुष (धिया) सुकर्म से वा उत्तम बुद्धि से (सम्) (ऋण्वति) चलता वा श्रेष्ठ बुद्धियुक्त होकर उन कर्मों को जानता है (सः) वही पुरुष हम लोगों को शिक्षा कर सकता है ॥२॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे अग्नि अपने व्यापार से दूत के सदृश कार्य्यों को सिद्ध करता है, वैसे ही विद्वान् लोग राज्य के कार्य्य आदिकों को सिद्ध कर सकते हैं ॥२॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है।