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Rigveda Mandal 3 / Sukta 11 / Mantra 1

62 Sukta
9 Mantra
3/11/1
Devata- अग्निः Rishi- गाथिनो विश्वामित्रः Chhanda- निचृद्गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
अ॒ग्निर्होता॑ पु॒रोहि॑तोऽध्व॒रस्य॒ विच॑र्षणिः। स वे॑द य॒ज्ञमा॑नु॒षक्॥

अ॒ग्निः । होता॑ । पु॒रःऽहि॑तः । अ॒ध्व॒रस्य॑ । विऽच॑र्षणिः । सः । वे॒द॒ । य॒ज्ञम् । आ॒नु॒षक् ॥

Mantra without Swara
अग्निर्होता पुरोहितोऽध्वरस्य विचर्षणिः। स वेद यज्ञमानुषक्॥

अग्निः। होता। पुरःऽहितः। अध्वरस्य। विऽचर्षणिः। सः। वेद। यज्ञम्। आनुषक्॥

Ashtak » 3 Adhyay » 1 Varga » 9 Mantra » 1

Available Bhashyas

1 Bhashyas
Meaning
जो मनुष्य (अध्वरस्य) जिसमें हिंसा न हो ऐसे कर्म का (विचर्षणिः) प्रकाशकर्त्ता (होता) दानकारक (पुरोहितः) सब जीवों के हित करनेवाले (अग्निः) अग्नि के सदृश होता है (सः) वह (आनुषक्) अनुकूलता से वर्त्तता हुआ (यज्ञम्) विधि यज्ञादि कर्म को (वेद) जानता है ॥१॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो पुरुष ब्रह्मचर्य और विद्या आदि उत्तम गुणों के ग्रहण करने में तत्पर होते हैं, वे ही अग्नि आदि पदार्थों को जान कर अर्थात् शिल्पविद्या में निपुण होकर संसार में प्रशंसा होने योग्य कर्मवाले होते हैं ॥१॥
Subject
अब ग्यारहवें सूक्त का आरम्भ है। इसके प्रथम मन्त्र में अग्न्यादि के दृष्टान्त से विद्वान् लोग क्या करें, इस विषय को कहा है।