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Rigveda Mandal 3 / Sukta 10 / Mantra 9

62 Sukta
9 Mantra
3/10/9
Devata- अग्निः Rishi- गाथिनो विश्वामित्रः Chhanda- निचृदुष्णिक् Swara- ऋषभः
Mantra with Swara
तं त्वा॒ विप्रा॑ विप॒न्यवो॑ जागृ॒वांसः॒ समि॑न्धते। ह॒व्य॒वाह॒मम॑र्त्यं सहो॒वृध॑म्॥

तम् । त्वा॒ । विप्राः॑ । वि॒प॒न्यवः॑ । जा॒गृ॒ऽवांसः॑ । सम् । इ॒न्ध॒ते॒ । ह॒व्य॒ऽवाह॑म् । अम॑र्त्यम् । स॒हः॒ऽवृध॑म् ॥

Mantra without Swara
तं त्वा विप्रा विपन्यवो जागृवांसः समिन्धते। हव्यवाहममर्त्यं सहोवृधम्॥

तम्। त्वा। विप्राः। विपन्यवः। जागृऽवांसः। सम्। इन्धते। हव्यऽवाहम्। अमर्त्यम्। सहःऽवृधम्॥

Ashtak » 3 Adhyay » 1 Varga » 8 Mantra » 4

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1 Bhashyas
Meaning
हे सत्य कहनेवाले विद्वान् पुरुष ! जो लोग (जागृवांसः) अविद्यारूप निद्रा से उठे विद्या में जागते हुए और (विपन्यवः) विशेषप्रकार से प्रशंसा किये गये (विप्राः) बुद्धिमान् जन (तम्) उन सम्पूर्ण विद्याओं के प्रकाश करनेवाले वक्ता (हव्यवाहम्) देने के योग्य विज्ञान के दाता (अमर्त्यम्) मनुष्य के स्वभाव से रहित होने से देवता स्वभाववाले (सहोवृधम्) बल से वा बल को बढ़ानेवाले (त्वा) आपको (सम्, इन्धते) प्रकाशित करते हैं, उनको आप सब ओर से शुभ गुणों के साथ प्रकाशित कीजिये ॥९॥
Essence
विद्वान् ही लोग विद्वानों के परिश्रम को जान सकते हैं, अन्य जन नहीं, इससे विद्वज्जन विद्वान् पुरुषों ही का सत्कार करें, मूर्खों का नहीं ॥९॥ इस सूक्त में अग्नि, परमात्मा और विद्वान् के गुणों का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की पिछले सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति है, यह जानना चाहिये ॥ यह दशवाँ सूक्त और आठवाँ वर्ग समाप्त हुआ ॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है।