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Rigveda Mandal 3 / Sukta 10 / Mantra 8

62 Sukta
9 Mantra
3/10/8
Devata- अग्निः Rishi- गाथिनो विश्वामित्रः Chhanda- विराडुष्णिक् Swara- ऋषभः
Mantra with Swara
स नः॑ पावक दीदिहि द्यु॒मद॒स्मे सु॒वीर्य॑म्। भवा॑ स्तो॒तृभ्यो॒ अन्त॑मः स्व॒स्तये॑॥

सः । नः॒ । पा॒व॒क॒ । दी॒दि॒हि॒ । द्यु॒ऽमत् । अ॒स्मे इति॑ । सु॒ऽवीर्य॑म् । भव॑ । स्तो॒तृऽभ्यः॑ । अन्त॑मः । स्व॒स्तये॑ ॥

Mantra without Swara
स नः पावक दीदिहि द्युमदस्मे सुवीर्यम्। भवा स्तोतृभ्यो अन्तमः स्वस्तये॥

सः। नः। पावक। दीदिहि। द्युऽमत्। अस्मे इति। सुऽवीर्यम्। भव। स्तोतृऽभ्यः। अन्तमः। स्वस्तये॥

Ashtak » 3 Adhyay » 1 Varga » 8 Mantra » 3

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1 Bhashyas
Meaning
हे (पावक) अग्नि के तुल्य पवित्रकारक विद्वान् पुरुष ! आप (स्तोतृभ्यः) विद्याओं के प्रचार करनेवाले (अस्मे) हम लोगों को (द्युमत्) प्रशंसा करने योग्य सद्विद्या के विज्ञान से युक्त (सुवीर्य्यम्) श्रेष्ठ धन दीजिये (सः) वह आप (नः) हम लोगों को (दीदिहि) प्रकाशित करो (स्वस्तये) सुख प्राप्ति के लिये (अन्तमः) समीप में वर्त्तमान (भव) हूजिये ॥८॥
Essence
विद्वज्जन जो कि स्वयं पवित्र हैं, उनको चाहिये कि औरों को भी विद्या और उत्तम शिक्षा से पवित्र करें, जिससे सम्पूर्ण पुरुष मित्र होकर सुख करने के लिये समर्थ हों ॥८॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है।