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Rigveda Mandal 3 / Sukta 10 / Mantra 5

62 Sukta
9 Mantra
3/10/5
Devata- अग्निः Rishi- गाथिनो विश्वामित्रः Chhanda- विराडुष्णिक् Swara- ऋषभः
Mantra with Swara
प्र होत्रे॑ पू॒र्व्यं वचो॒ऽग्नये॑ भरता बृ॒हत्। वि॒पां ज्योतीं॑षि॒ बिभ्र॑ते॒ न वे॒धसे॑॥

प्र । होत्रे॑ । पू॒र्व्यम् । वचः॑ । अ॒ग्नये॑ । भ॒र॒त॒ । बृ॒हत् । वि॒पाम् । ज्योतीं॑षि । बिभ्र॑ते । न । वे॒धसे॑ ॥

Mantra without Swara
प्र होत्रे पूर्व्यं वचोऽग्नये भरता बृहत्। विपां ज्योतींषि बिभ्रते न वेधसे॥

प्र। होत्रे। पूर्व्यम्। वचः। अग्नये। भरत। बृहत्। विपाम्। ज्योतींषि। बिभ्रते। न। वेधसे॥

Ashtak » 3 Adhyay » 1 Varga » 7 Mantra » 5

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Meaning
हे विद्वज्जनो ! (होत्रे) ग्रहण करनेवाले (अग्नये) अग्नि के (न) समान (विपाम्) उत्तम बुद्धिवालों के (ज्योतींषि) विद्यारूप तेजों को (बिभ्रते) धारण करते हुए (वेधसे) बुद्धिमान् के लिये (बृहत्) महत् प्रयोजनवाले (पूर्व्यम्) प्राचीन विद्वानों से उपदेश किये हुए (वचः) वचन को (प्र, भरत) उपदेश कीजिये ॥५॥
Essence
इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जैसे यज्ञ करनेवाले यज्ञ के लिये घृत आदि पदार्थों से उत्तम प्रकार पूर्वक पकाये हुए अन्नों से अग्नि की वृद्धि करते हैं, वैसे ही अध्यापक पुरुष अङ्ग और उपाङ्गों के सहित सम्पूर्ण विद्याओं के प्रचार से विद्यार्थी और श्रोतृजनों को तृप्त करें ॥५॥
Subject
अब अध्यापक और विद्वान् के कर्तव्य को कहते हैं।

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