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Rigveda Mandal 3 / Sukta 10 / Mantra 4

62 Sukta
9 Mantra
3/10/4
Devata- अग्निः Rishi- गाथिनो विश्वामित्रः Chhanda- निचृदुष्णिक् Swara- ऋषभः
Mantra with Swara
स के॒तुर॑ध्व॒राणा॑म॒ग्निर्दे॒वेभि॒रा ग॑मत्। अ॒ञ्जा॒नः स॒प्त होतृ॑भिर्ह॒विष्म॑ते॥

सः । के॒तुः । अ॒ध्व॒राणा॑म् । अ॒ग्निः । दे॒वेभिः॑ । आ । ग॒म॒त् । अ॒ञ्जा॒नः । स॒प्त । होतृ॑ऽभिः । ह॒विष्म॑ते ॥

Mantra without Swara
स केतुरध्वराणामग्निर्देवेभिरा गमत्। अञ्जानः सप्त होतृभिर्हविष्मते॥

सः। केतुः। अध्वराणाम्। अग्निः। देवेभिः। आ। गमत्। अञ्जानः। सप्त। होतृऽभिः। हविष्मते॥

Ashtak » 3 Adhyay » 1 Varga » 7 Mantra » 4

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Meaning
हे विद्वन् पुरुष ! जैसे (सः) वह (केतुः) ध्वजा के तुल्य प्रज्ञापक (अञ्जानः) दिव्य गुणों को प्रकट करता हुआ प्रसिद्ध (अग्निः) अग्नि (देवेभिः) दिव्य गुणोंवाले पदार्थों के तुल्य विद्वानों और (होतृभिः) ग्रहण करनेहारे (सप्त) पाँच प्राण, मन और बुद्धि के साथ (अध्वराणाम्) अहिंसारूप यज्ञों के सम्बन्धी (हविष्मते) प्रशस्त देने योग्य पदार्थोंवाले जन के लिये (आ, अगमत्) आवे प्राप्त होवे अर्थात् अग्निविद्यायुक्त होवे, वैसे तू प्राप्त हो ॥४॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे विज्ञान कर सम्यक् सेवन किया अग्नि दिव्य गुणों को देता है, वैसे ही सेवन किये आप्त विद्वान् जन अहिंसादि रूप धर्म को जताकर श्रोताओं के लिये दिव्य सुखों को देते हैं ॥४॥
Subject
अब उपदेशक का कर्तव्य कहते हैं।

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