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Rigveda Mandal 3 / Sukta 1 / Mantra 9

62 Sukta
23 Mantra
3/1/9
Devata- अग्निः Rishi- गाथिनो विश्वामित्रः Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
पि॒तुश्चि॒दूध॑र्ज॒नुषा॑ विवेद॒ व्य॑स्य॒ धारा॑ असृज॒द्वि धेनाः॑। गुहा॒ चर॑न्तं॒ सखि॑भिः शि॒वेभि॑र्दि॒वो य॒ह्वीभि॒र्न गुहा॑ बभूव॥

पि॒तुः । चि॒त् । ऊधः॑ । ज॒नुषा॑ । वि॒वे॒द॒ । वि । अ॒स्य॒ । धाराः॑ । अ॒सृ॒ज॒त् । वि । धेनाः॑ । गुहा॑ । चर॑न्तम् । सखि॑ऽभिः । शि॒वेभिः॑ । दि॒वः । य॒ह्वीभिः॑ । न । गुहा॑ । ब॒भू॒व॒ ॥

Mantra without Swara
पितुश्चिदूधर्जनुषा विवेद व्यस्य धारा असृजद्वि धेनाः। गुहा चरन्तं सखिभिः शिवेभिर्दिवो यह्वीभिर्न गुहा बभूव॥

पितुः। चित्। ऊधः। जनुषा। विवेद। वि। अस्य। धाराः। असृजत्। वि। धेनाः। गुहा। चरन्तम्। सखिऽभिः। शिवेभिः। दिवः। यह्वीभिः। न। गुहा। बभूव॥

Ashtak » 2 Adhyay » 8 Varga » 14 Mantra » 4

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1 Bhashyas
Meaning
जैसे (ऊधः) रात्री (विबभूव) विशेषता से होती है वा जैसे (अस्य) इस जल की (धाराः) धाराओं के (चित्) समान प्रवाह (गुहा) बुद्धि में होते हैं वैसे जो (पितुः) पिता की उत्तेजना से गर्भ में स्थिर होकर (जनुषा) जन्म से प्रकट होकर (शिवेभिः) मङ्गलकारी (सखिभिः) मित्र वर्गों के साथ (दिवः) विद्या की दीप्ति जो (यह्वीः) बड़ी-बड़ी उनके (न) समान (गुहा) कन्दरा में (चरन्तम्) विचरते हुए को (विवेद) जानता है (धेनाः) प्रीयप्राण सन्तानों के समान (व्यसृजत्) विशेषता से उत्पन्न को वह सुख प्राप्त होता है ॥९॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे अन्धकार में स्थित वस्तु नहीं दीख पड़ती, जैसे दीप से प्राप्त होती, वैसे पिता के शरीर में वर्त्तमान जीव गर्भ में स्थित हुआ नहीं दीखता और जब इसका जन्म होता है तब दीखता है। इस प्रकार जो मङ्गलाचरणों से मित्रों के साथ विद्याओं का ग्रहण करता है, वह आत्मा को जान बड़ा होता है ॥९॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है।