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Rigveda Mandal 3 / Sukta 1 / Mantra 8

62 Sukta
23 Mantra
3/1/8
Devata- अग्निः Rishi- गाथिनो विश्वामित्रः Chhanda- स्वराट्पङ्क्ति Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
ब॒भ्रा॒णः सू॑नो सहसो॒ व्य॑द्यौ॒द्दधा॑नः शु॒क्रा र॑भ॒सा वपूं॑षि। श्चोत॑न्ति॒ धारा॒ मधु॑नो घृ॒तस्य॒ वृषा॒ यत्र॑ वावृ॒धे काव्ये॑न॥

ब॒भ्रा॒णः । सू॒नो॒ इति॑ । स॒ह॒सः॒ । वि । अ॒द्यौ॒त् । दधा॑नः । शु॒क्रा । र॒भ॒सा । वपूं॑षि । श्चोत॑न्ति । धाराः॑ । मधु॑नः । घृ॒तस्य॑ । वृषा॑ । यत्र॑ । व॒वृ॒धे । काव्ये॑न ॥

Mantra without Swara
बभ्राणः सूनो सहसो व्यद्यौद्दधानः शुक्रा रभसा वपूंषि। श्चोतन्ति धारा मधुनो घृतस्य वृषा यत्र वावृधे काव्येन॥

बभ्राणः। सूनो इति। सहसः। वि। अद्यौत्। दधानः। शुक्रा। रभसा। वपूंषि। श्चोतन्ति। धाराः। मधुनः। घृतस्य। वृषा। यत्र। ववृधे। काव्येन॥

Ashtak » 2 Adhyay » 8 Varga » 14 Mantra » 3

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1 Bhashyas
Meaning
हे (सूनो) सन्तान ! जैसे (शुक्रा) शरीर आत्मा और बल तथा (रभसा) रोगरहित (वपूंषि) रूपवान् शरीरों को (दधानः) धारण करता हुआ जो (मधुनः) मीठे (घृतस्य) जल की (धाराः) धाराओं के समान वाणी (श्चोतन्ति) झरती हैं (यत्र) जिस व्यवहार में (वृषा) बलवान् जन (काव्येन) विद्वानों के निर्माण किये और पढ़े हुए कविताई आदि कर्म के साथ (वावृधे) बढ़ता है (सहसः) बल से (व्यद्यौत्) प्रकाशित होता है वैसे ही इन उक्त पदार्थों से (बभ्राणः) पुष्ट होते हुए बढ़ो ॥८॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे उत्तम शिक्षा पाये हुए सज्जनों की वाणी जल के समान कोमल और सरस होती हैं, जैसे ब्रह्मचारी बलवान् होता है, वैसे सन्तानों को चाहिये कि विद्या सुशिक्षाओं को अच्छे प्रकार ग्रहण कर बलवान् और सुशील होवें ॥८॥
Subject
अब विद्याजन्म की प्रशंसा को अगले मन्त्र में कहा है।