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Rigveda Mandal 3 / Sukta 1 / Mantra 21

62 Sukta
23 Mantra
3/1/21
Devata- अग्निः Rishi- गाथिनो विश्वामित्रः Chhanda- विराट्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
जन्म॑न्जन्म॒न् निहि॑तो जा॒तवे॑दा वि॒श्वामि॑त्रेभिरिध्यते॒ अज॑स्रः। तस्य॑ व॒यं सु॑म॒तौ य॒ज्ञिय॒स्यापि॑ भ॒द्रे सौ॑मन॒से स्या॑म॥

जन्म॑न्ऽजन्मन् । निऽहि॑तः । जा॒तऽवे॑दाः । वि॒श्वामि॑त्रेभिः । इ॒ध्य॒ते॒ । अज॑स्रः । तस्य॑ । व॒यम् । सु॒ऽम॒तौ । य॒ज्ञिय॑स्य । अपि॑ । भ॒द्रे । सौ॒म॒न॒से । स्या॒म॒ ॥

Mantra without Swara
जन्मन्जन्मन् निहितो जातवेदा विश्वामित्रेभिरिध्यते अजस्रः। तस्य वयं सुमतौ यज्ञियस्यापि भद्रे सौमनसे स्याम॥

जन्मन्ऽजन्मन्। निऽहितः। जातऽवेदाः। विश्वामित्रेभिः। इध्यते। अजस्रः। तस्य। वयम्। सुऽमतौ। यज्ञियस्य। अपि। भद्रे। सौमनसे। स्याम॥

Ashtak » 2 Adhyay » 8 Varga » 16 Mantra » 6

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1 Bhashyas
Meaning
हे जीव ! परमेश्वर ने (जन्मन् जन्मन्) जन्म-जन्म में (निहितः) कर्म्मों के अनुसार संस्थापन किया (जातवेदाः) उत्पन्न हुए पदार्थों में न उत्पन्न हुए के समान वर्तमान (विश्वामित्रेभिः) समस्त संसार जिनका मित्र उन सज्जनों से (अजस्रः) निरन्तर (इध्यते) प्रबोधित कराया जाता (तस्य) उस (यज्ञियस्य) यज्ञ के होते हुए प्राणी की (सुमतौ) प्रशंसित प्रज्ञा में और (भद्रे) कल्याण करनेवाले व्यवहार में तथा (सौमनसे) सुन्दर मन के भाव में (अपि) भी हम लोग (स्याम) होवें ॥२१॥
Essence
सब मनुष्यों को प्रसिद्ध जगत् में सुख-दुःखादि न्यून अधिक फलों को देखकर पहिले जन्म में सञ्चित कर्म फल का अनुमान करना चाहिये, जो परमेश्वर कर्म फल का देनेवाला न हो तो व्यवस्था भी प्राप्त न हो, इसलिये सबको श्रेष्ठ बुद्धि उत्पन्न कर वैर आदि छोड़ सबके साथ स़त्य भाव से वर्तना चाहिये ॥२१॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है।