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Rigveda Mandal 3 / Sukta 1 / Mantra 18

62 Sukta
23 Mantra
3/1/18
Devata- अग्निः Rishi- गाथिनो विश्वामित्रः Chhanda- भुरिक्पङ्क्ति Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
नि दु॑रो॒णे अ॒मृतो॒ मर्त्या॑नां॒ राजा॑ ससाद वि॒दथा॑नि॒ साध॑न्। घृ॒तप्र॑तीक उर्वि॒या व्य॑द्यौद॒ग्निर्विश्वा॑नि॒ काव्या॑नि वि॒द्वान्॥

नि । दु॒रो॒णे । अ॒मृतः॑ । मर्त्या॑नाम् । राजा॑ । स॒सा॒द॒ । वि॒दथा॑नि । साध॑न् । घृ॒तऽप्र॑तीकः । उ॒र्वि॒या । वि । अ॒द्यौ॒त् । अ॒ग्निः । विश्वा॑नि । काव्या॑नि । वि॒द्वान् ॥

Mantra without Swara
नि दुरोणे अमृतो मर्त्यानां राजा ससाद विदथानि साधन्। घृतप्रतीक उर्विया व्यद्यौदग्निर्विश्वानि काव्यानि विद्वान्॥

नि। दुरोणे। अमृतः। मर्त्यानाम्। राजा। ससाद। विदथानि। साधन्। घृतऽप्रतीकः। उर्विया। वि। अद्यौत्। अग्निः। विश्वानि। काव्यानि। विद्वान्॥

Ashtak » 2 Adhyay » 8 Varga » 16 Mantra » 3

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Meaning
जो (अमृतः) आत्मरूप से मृत्यु धर्मरहित (विद्वान्) विद्वान् (दुरोणे) घर में (मर्त्यानाम्) मनुष्यों के बीच (घृतप्रतीकः) घृत जिसका प्रकाश करनेवाला (अग्निः) वह अग्नि (उर्विया) पृथिवी पर (वि, अद्यौत्) विशेषता से प्रकाशित होते हुए के समान (विश्वानि) समस्त (विदथानि) विज्ञानों वा (काव्यानि) विशेष आक्रमण करती हुई बुद्धियोंवाले विद्वानों के बनाए शास्त्रों का अध्ययन कर सबका हित (साधन) सिद्ध करते हुए मनुष्यों के बीच (निषसाद) स्थिर हो वह हम लोगों को सत्कार करने योग्य है ॥१८॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे अग्नि सूर्यरूप से सबको प्रकाशित करता है, वैसे पूर्ण विद्यायुक्त सभापति राजा धर्म से प्रजाजनों की अच्छे प्रकार पालना कर विद्याओं का प्रकाश करता है, वह सबको सत्कार करने योग्य कैसे न हो ॥१८॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है।

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