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Rigveda Mandal 3 / Sukta 1 / Mantra 16

62 Sukta
23 Mantra
3/1/16
Devata- अग्निः Rishi- गाथिनो विश्वामित्रः Chhanda- स्वराट्पङ्क्ति Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
उ॒प॒क्षे॒तार॒स्तव॑ सुप्रणी॒तेऽग्ने॒ विश्वा॑नि॒ धन्या॒ दधा॑नाः। सु॒रेत॑सा॒ श्रव॑सा॒ तुञ्ज॑माना अ॒भि ष्या॑म पृतना॒यूँरदे॑वान्॥

उ॒प॒ऽक्षे॒तारः॑ । तव॑ । सु॒ऽप्र॒नी॒ते॒ । अ॒ग्ने॒ । विश्वा॑नि । धन्या॑ । दधा॑नाः । सु॒ऽरेत॑सा । श्रव॑सा । तुञ्ज॑मानाः । अ॒भि । स्या॒म॒ । पृ॒त॒ना॒ऽयून् । अदे॑वान् ॥

Mantra without Swara
उपक्षेतारस्तव सुप्रणीतेऽग्ने विश्वानि धन्या दधानाः। सुरेतसा श्रवसा तुञ्जमाना अभि ष्याम पृतनायूँरदेवान्॥

उपऽक्षेतारः। तव। सुऽप्रनीते। अग्ने। विश्वानि। धन्या। दधानाः। सुऽरेतसा। श्रवसा। तुञ्जमानाः। अभि। स्याम। पृतनाऽयून्। अदेवान्॥

Ashtak » 2 Adhyay » 8 Varga » 16 Mantra » 1

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Meaning
हे (सुप्रणीते) अपने से सुन्दर उत्तमोत्तम नीति का प्रकाश करनेवाले (अग्ने) पूर्ण विद्यायुक्त ! (तव) तुम्हारी उत्तेजना से विद्वान् होकर (पृतनायून्) सेनाओं में पूर्ण आयु जिनकी विद्यमान जन (अदेवान्) अविद्वान् (उपक्षेतारः) समीप प्राप्त हुए जनों को छिन्न-भिन्न करनेवाले (सुरेतसा) सुन्दर संयुक्त वीर्य्य और (श्रवसा) श्रवण से (विश्वानि) समस्त (धन्या) धन के योग्य पदार्थों को (दधानाः) धारण करते और (तुञ्जमानाः) बल करते हुए हम लोग सुखी (अभिष्याम) सब ओर से होवें ॥१६॥
Essence
जो मनुष्य अविद्वानों की उपेक्षा करके विद्वानों का सेवन करते हैं। वे सब ऐश्वर्य को प्राप्त होते हैं ॥१६॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है।

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