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Rigveda Mandal 3 / Sukta 1 / Mantra 14

62 Sukta
23 Mantra
3/1/14
Devata- अग्निः Rishi- गाथिनो विश्वामित्रः Chhanda- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
बृ॒हन्त॒ इद्भा॒नवो॒ भाऋ॑जीकम॒ग्निं स॑चन्त वि॒द्युतो॒ न शु॒क्राः। गुहे॑व वृ॒द्धं सद॑सि॒ स्वे अ॒न्तर॑पा॒र ऊ॒र्वे अ॒मृतं॒ दुहा॑नाः॥

बृ॒हन्तः॑ । इत् । भा॒नवः॑ । भाःऽऋ॑जीकम् । अ॒ग्निम् । स॒च॒न्त॒ । वि॒ऽद्युतः॑ । न । शु॒क्राः । गुहा॑ऽइव । वृ॒द्धम् । सद॑सि । स्वे । अ॒न्तः । अ॒पा॒रे । ऊ॒र्वे । अ॒मृतम् । दुहा॑नाः ॥

Mantra without Swara
बृहन्त इद्भानवो भाऋजीकमग्निं सचन्त विद्युतो न शुक्राः। गुहेव वृद्धं सदसि स्वे अन्तरपार ऊर्वे अमृतं दुहानाः॥

बृहन्तः। इत्। भानवः। भाःऽऋजीकम्। अग्निम्। सचन्त। विऽद्युतः। न। शुक्राः। गुहाऽइव। वृद्धम्। सदसि। स्वे। अन्तः। अपारे। ऊर्वे। अमृतम्। दुहानाः॥

Ashtak » 2 Adhyay » 8 Varga » 15 Mantra » 4

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1 Bhashyas
Meaning
हे मनुष्यो ! जो (बृहन्तः) महान् (अमृतम्) कारणरूप से नाशरहित जल को (दुहानाः) पूर्ण करते हुए (भानवः) किरण वा दीप्ति (विद्युतः) बिजुलियों के (न) समान (शुक्राः) शुद्ध (सदसि) सभा में (वृद्धम्) विद्या और अवस्था से जो अतीव प्रशंसित उसके समान आत्मा को (गुहेव) बुद्धिस्थ जीव के समान (भाऋजीकम्) दीप्तियों में सरल (अग्निम्) अग्नि को (सचन्त) सम्बन्ध वा मेल करते हैं जो (अपारे) अगाध द्यावापृथिवी (स्वे) निज सम्बन्ध करनेवाले (ऊर्वे) लोक संघर्षण करनेवाले अभिव्याप्त होकर (अन्तः) बीच में विराजमान हैं (इत्) उन्हीं को जानो ॥१४॥
Essence
इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जो अग्नि सर्वत्र स्थित सूर्य वा भौमरूप से प्रसिद्ध बिजुली रूप से गुप्त मेघादि पदार्थों का निमित्त है, उसको जानकर अभीष्ट सिद्ध करना चाहिये ॥१४
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है।