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Rigveda Mandal 2 / Sukta 9 / Mantra 6

43 Sukta
6 Mantra
2/9/6
Devata- अग्निः Rishi- गृत्समदः शौनकः Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
सैनानी॑केन सुवि॒दत्रो॑ अ॒स्मे यष्टा॑ दे॒वाँ आय॑जिष्ठः स्व॒स्ति। अद॑ब्धो गो॒पा उ॒त नः॑ पर॒स्पा अग्ने॑ द्यु॒मदु॒त रे॒वद्दि॑दीहि॥

सः । ए॒ना । अनी॑केन । सु॒ऽवि॒दत्रः॑ । अ॒स्मे इति॑ । यष्टा॑ । दे॒वान् । आऽय॑जिष्ठः । स्व॒स्ति । अद॑ब्धः । गो॒पाः । उ॒त । नः॒ । प॒रः॒ऽपाः । अग्ने॑ । द्यु॒ऽमत् । उ॒त । रे॒वत् । दि॒दी॒हि॒ ॥

Mantra without Swara
सैनानीकेन सुविदत्रो अस्मे यष्टा देवाँ आयजिष्ठः स्वस्ति। अदब्धो गोपा उत नः परस्पा अग्ने द्युमदुत रेवद्दिदीहि॥

सः। एना। अनीकेन। सुऽविदत्रः। अस्मे इति। यष्टा। देवान्। आऽयजिष्ठः। स्वस्ति। अदब्धः। गोपाः। उत। नः। परःऽपाः। अग्ने। द्युऽमत्। उत। रेवत्। दिदीहि॥

Ashtak » 2 Adhyay » 6 Varga » 1 Mantra » 6

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Meaning
हे (अग्ने) अग्नि के समान विद्वान् ! जैसे (सः) वह देनेवाला (अस्मे) हमारे (एना) इस (अनीकेन) सेना समूह के साथ (सुविदत्रः) सुन्दर विज्ञान देने (यष्टा) और सब व्यवहारों की सङ्गति करनेवाला अच्छा ज्ञानी वा दाता (आ,यजिष्ठः) सब ओर से अतीव यज्ञकर्त्ता (अदब्धः) न नष्ट हुआ (गोपाः) गोपाल (नः) हमको (परस्पाः) दुःखों से पार करनेवाला (द्युमत्) विज्ञान प्रकाशयुक्त (उत) और (रेवत्) बहुत धन सहित (स्वस्ति) सुख को देता है (उत) और (देवान्) दिव्य गुण वा अपना विजय चाहनेवाले वीरों को सेवते हैं, वैसे आप उक्त समस्त को (दीदिहि) दीजिये ॥६॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे उत्तम सेना से युक्त राजा दुष्टों को जीत विद्वानों का सत्कार कर और प्रजा की अच्छे प्रकार रक्षा कर सबका ऐश्वर्य बढ़ाता है, वैसे सभों को होना चाहिये ॥६॥ इस सूक्त में अग्नि के समान विद्वानों के गुणों का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की पिछले सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति है, यह जानना चाहिये ॥ यह नववाँ सूक्त और पहिला वर्ग समाप्त हुआ ॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है।

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