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Rigveda Mandal 2 / Sukta 9 / Mantra 5

43 Sukta
6 Mantra
2/9/5
Devata- अग्निः Rishi- गृत्समदः शौनकः Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
उ॒भयं॑ ते॒ न क्षी॑यते वस॒व्यं॑ दि॒वेदि॑वे॒ जाय॑मानस्य दस्म। कृ॒धि क्षु॒मन्तं॑ जरि॒तार॑मग्ने कृ॒धि पतिं॑ स्वप॒त्यस्य॑ रा॒यः॥

उ॒भय॑म् । ते॒ । न । क्षी॒य॒ते॒ । व॒स॒व्य॑म् । दि॒वेऽदि॑वे॒ । जाय॑मानस्य । द॒स्म॒ । कृ॒धि । क्षु॒ऽमन्त॑म् । जरि॒तार॑म् । अ॒ग्ने॒ । कृ॒धि । पति॑म् । सु॒ऽअ॒प॒त्यस्य॑ । रा॒यः ॥

Mantra without Swara
उभयं ते न क्षीयते वसव्यं दिवेदिवे जायमानस्य दस्म। कृधि क्षुमन्तं जरितारमग्ने कृधि पतिं स्वपत्यस्य रायः॥

उभयम्। ते। न। क्षीयते। वसव्यम्। दिवेऽदिवे। जायमानस्य। दस्म। कृधि। क्षुऽमन्तम्। जरितारम्। अग्ने। कृधि। पतिम्। सुऽअपत्यस्य। रायः॥

Ashtak » 2 Adhyay » 6 Varga » 1 Mantra » 5

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Meaning
हे (दस्म) पर-दुःख-भञ्जन करनेवाले और (अग्ने) अग्नि के समान बढ़नेवाले विद्वान् ! (दिवेदिवे) प्रतिदिन (जायमानस्य) सिद्ध हुए जिन (ते) आपका (उभयम्) दान और यज्ञ करना दोनों (वसव्यम्) धनों में प्रसिद्ध हुए काम (न) नहीं (क्षीयते) नष्ट होते सो आप (जरितारम्) विद्यादि गुण की प्रशंसा करनेवाले (क्षुमन्तम्) बहुत अन्नवाले को (कृधि) उत्पन्न करो और (स्वपत्यस्य) जिससे उत्तम सन्तान होते उस (रायः) देने योग्य धन को (पतिम्) पालने रखनेवाले को (कृधि) कीजिये ॥५॥
Essence
उसी के कुल से धन नाश नहीं होता, जो और सुपात्रों के लिये संसार का उपकार करने को देता है ॥५॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है।

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