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Rigveda Mandal 2 / Sukta 9 / Mantra 3

43 Sukta
6 Mantra
2/9/3
Devata- अग्निः Rishi- गृत्समदः शौनकः Chhanda- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
वि॒धेम॑ ते पर॒मे जन्म॑न्नग्ने वि॒धेम॒ स्तोमै॒रव॑रे स॒धस्थे॑। यस्मा॒द्योने॑रु॒दारि॑था॒ यजे॒ तं प्र त्वे ह॒वींषि॑ जुहुरे॒ समि॑द्धे॥

वि॒धेम॑ । ते । प॒र॒मे । जन्म॑न् । अ॒ग्ने॒ । वि॒धेम॑ । स्तोमैः॑ । अव॑रे । स॒धऽस्थे॑ । यस्मा॑त् । योनेः॑ । उ॒त्ऽआरि॑थ । यजे॑ । तम् । प्र । त्वे इति॑ । ह॒वींषि॑ । जु॒हु॒रे॒ । सम्ऽइ॑द्धे ॥

Mantra without Swara
विधेम ते परमे जन्मन्नग्ने विधेम स्तोमैरवरे सधस्थे। यस्माद्योनेरुदारिथा यजे तं प्र त्वे हवींषि जुहुरे समिद्धे॥

विधेम। ते। परमे। जन्मन्। अग्ने। विधेम। स्तोमैः। अवरे। सधऽस्थे। यस्मात्। योनेः। उत्ऽआरिथ। यजे। तम्। प्र। त्वे इति। हवींषि। जुहुरे। सम्ऽइद्धे॥

Ashtak » 2 Adhyay » 6 Varga » 1 Mantra » 3

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1 Bhashyas
Meaning
हे (अग्ने) विद्वान् ! हम लोग (स्तोमैः) स्तुतियों से (ते) आपके (परमे) उत्तम और (अवरे) अनुत्तम जन्म के निमित्त (विधेम) विचारें (यस्मात्) जिस (योनेः) कारण से आप (उदारिथ) प्राप्त होते हो उस (सधस्थे) साथ के स्थान में हम लोग (विधेम) उत्तम व्यवहार का विधान करें जैसे (त्वे) उस (समिद्धे) प्रदीप्त अग्नि में (हवींषि) होमने अर्थात् देने योग्य पदार्थों को विद्वान् जन (जुहुरे) होमते वैसे मैं (तम्) उसका (प्रयजे) पदार्थों से सङ्ग करुँ ॥३॥
Essence
जो शुभ कर्मों को करते हैं वे श्रेष्ठ जन्म को प्राप्त होते हैं। जो अधर्म का आचरण करते हैं, वे नीच जन्म को प्राप्त होते हैं। जैसे विद्वान् जन जलते हुए अग्नि में सुगन्ध्यादि द्रव्य का होम कर संसार का उपकार करते हैं, वैसे वे सबसे उपकार को वर्त्तमान जन्म में वा जन्मान्तर में प्राप्त होते हैं ॥३॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है।