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Rigveda Mandal 2 / Sukta 7 / Mantra 4

43 Sukta
6 Mantra
2/7/4
Devata- अग्निः Rishi- सोमाहुतिर्भार्गवः Chhanda- त्रिपाद्गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
शुचिः॑ पावक॒ वन्द्योऽग्ने॑ बृ॒हद्वि रो॑चसे। त्वं घृ॒तेभि॒राहु॑तः॥

शुचिः॑ । पा॒व॒क॒ । वन्द्यः॑ । अग्ने॑ । बृ॒हत् । वि । रो॒च॒से॒ । त्वम् । घृ॒तेभिः॑ । आऽहु॑तः ॥

Mantra without Swara
शुचिः पावक वन्द्योऽग्ने बृहद्वि रोचसे। त्वं घृतेभिराहुतः॥

शुचिः। पावक। वन्द्यः। अग्ने। बृहत्। वि। रोचसे। त्वम्। घृतेभिः। आऽहुतः॥

Ashtak » 2 Adhyay » 5 Varga » 28 Mantra » 4

Bhashya

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Meaning
हे (पावक) पवित्र करनेवाले (अग्ने) अग्नि के समान प्रकाशमान ! (घृतेभिः) घी आदि पदार्थों से अग्नि के समान (शुचिः) पवित्र (वन्द्यः) स्तुति के योग्य (आहुतः) आमन्त्रित (त्वम्) आप (बृहत्) बहुत (विरोचसे) प्रकाशमान होते हैं, सो सत्कार करने योग्य हैं ॥४॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे घी आदि पदार्थों से प्रज्वलित किया हुआ पवित्र करनेवाला अग्नि बहुत प्रकाशित होता है, वैसे सत्कार पाया हुआ विद्वान् जन बहुत उपकार करता है ॥४॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है।

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