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Rigveda Mandal 2 / Sukta 6 / Mantra 8

43 Sukta
8 Mantra
2/6/8
Devata- अग्निः Rishi- सोमाहुतिर्भार्गवः Chhanda- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
स वि॒द्वाँ आ च॑ पिप्रयो॒ यक्षि॑ चिकित्व आनु॒षक्। आ चा॒स्मिन्त्स॑त्सि ब॒र्हिषि॑॥

सः । वि॒द्वान् । आ । च॒ । पि॒प्र॒यः॒ । यक्षि॑ । चि॒कि॒त्वः॒ । आ॒नु॒षक् । आ । च॒ । अ॒स्मिन् । स॒त्सि॒ । ब॒र्हिषि॑ ॥

Mantra without Swara
स विद्वाँ आ च पिप्रयो यक्षि चिकित्व आनुषक्। आ चास्मिन्त्सत्सि बर्हिषि॥

सः। विद्वान्। आ। च। पिप्रयः। यक्षि। चिकित्वः। आनुषक्। आ। च। अस्मिन्। सत्सि। बर्हिषि॥

Ashtak » 2 Adhyay » 5 Varga » 27 Mantra » 8

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1 Bhashyas
Meaning
हे (चिकित्वः) विज्ञानवान् ईश्वर (सः) वह (विद्वान्) विद्वान् ! आप (अस्मिन्) इस (बर्हिषि) अन्तरिक्ष जगत् में (आसत्सि) आसन्न हो रहे हो प्राप्त हो रहे हो सो आप (आनुषक्) अनुकूल जैसे हो वैसे (आ, पिप्रयः) अच्छे प्रसन्न करते (च) और (यक्षि, च) अच्छे प्रकार सब वस्तु देते हो ॥८॥
Essence
हे मनुष्यो! आप लोग जो इस जगत् में व्याप्त, प्रिय पदार्थ का देनेवाला और सर्वज्ञ अन्तर्यामी ईश्वर है, उसी की उपासना करें ॥८॥ इस सूक्त में वह्नि और ईश्वर के गुणों का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की पिछले सूक्तार्थ के साथ सङ्गति है, यह जानना चाहिये ॥ यह छठा सूक्त और सत्ताईसवाँ वर्ग समाप्त हुआ ॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है।