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Rigveda Mandal 2 / Sukta 6 / Mantra 5

43 Sukta
8 Mantra
2/6/5
Devata- अग्निः Rishi- सोमाहुतिर्भार्गवः Chhanda- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
स नो॑ वृ॒ष्टिं दि॒वस्परि॒ स नो॒ वाज॑मन॒र्वाण॑म्। स नः॑ सह॒स्रिणी॒रिषः॑॥

सः । नः॒ । वृ॒ष्टिम् । दि॒वः । परि॑ । सः । नः॒ । वाज॑म् । अ॒न॒र्वाण॑म् । सः । नः॒ । स॒ह॒स्रिणीः॑ । इषः॑ ॥

Mantra without Swara
स नो वृष्टिं दिवस्परि स नो वाजमनर्वाणम्। स नः सहस्रिणीरिषः॥

सः। नः। वृष्टिम्। दिवः। परि। सः। नः। वाजम्। अनर्वाणम्। सः। नः। सहस्रिणीः। इषः॥

Ashtak » 2 Adhyay » 5 Varga » 27 Mantra » 5

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Meaning
हे विद्वान् ! जैसे (सः) वह अग्नि (नः) हम लोगों के लिये (दिवः) सूर्यप्रकाश और मेघमण्डल से (वृष्टिम्) वर्षाओं को करता है वा (सः) वह अग्नि (नः) हम लोगों को (अनर्वाणम्) घोड़े जिसमें नहीं विद्यमान हैं उस (वाजम्) वेगवान् रथ को प्राप्त कराता है वा (सः) वह अग्नि (नः) हमारे लिये (सहस्रिणीः) असंख्यात प्रकार के (इषः) अन्नों को (परि) सब ओर से उत्पन्न कराता है, वैसे आप वर्त्ताव कीजिये ॥५॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। मनुष्यों को वैसा यत्न करना चाहिये जिससे अग्नि की उत्तेजना से बहुत उपकार हों ॥५॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है।

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