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Rigveda Mandal 2 / Sukta 6 / Mantra 3

43 Sukta
8 Mantra
2/6/3
Devata- अग्निः Rishi- सोमाहुतिर्भार्गवः Chhanda- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
तं त्वा॑ गी॒र्भिर्गिर्व॑णसं द्रविण॒स्युं द्र॑विणोदः। स॒प॒र्येम॑ सप॒र्यवः॑॥

तम् । त्वा॒ । गीः॒ऽभिः । गिर्व॑णसम् । द्र॒वि॒ण॒स्युम् । द्र॒वि॒णः॒ऽदः॒ । स॒प॒र्येम॑ । स॒प॒र्यवः॑ ॥

Mantra without Swara
तं त्वा गीर्भिर्गिर्वणसं द्रविणस्युं द्रविणोदः। सपर्येम सपर्यवः॥

तम्। त्वा। गीःऽभिः। गिर्वणसम्। द्रविणस्युम्। द्रविणःऽदः। सपर्येम। सपर्यवः॥

Ashtak » 2 Adhyay » 5 Varga » 27 Mantra » 3

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1 Bhashyas
Meaning
हे (द्रविणोदाः) धन को देनेवाले विद्वान् जन ! अग्नि के समान वर्त्तमान (द्रविणस्युम्) अपने को धन की इच्छा करनेवाले (गिर्वणसम्) विद्या की वाणी को सेवते हुए (तम्) उन (त्वा) आपको (सपर्यवः) अपने को सेवने की इच्छा करनेवाले जन (गीर्भिः) सुन्दर शिक्षित वाणियों से सेवते हैं, वैसे हम लोग (सपर्येम) सेवन करें ॥३॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो गुण, कर्म, स्वभाव से अग्नि को विशेष जानकर कार्यसिद्धि के लिये उसका अच्छे प्रकार प्रयोग करते हैं, वे श्रीमान् होते हैं ॥३॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है।