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Rigveda Mandal 2 / Sukta 5 / Mantra 8

43 Sukta
8 Mantra
2/5/8
Devata- अग्निः Rishi- सोमाहुतिर्भार्गवः Chhanda- विराडनुष्टुप् Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
यथा॑ वि॒द्वाँ अरं॒ कर॒द्विश्वे॑भ्यो यज॒तेभ्यः॑। अ॒यम॑ग्ने॒ त्वे अपि॒ यं य॒ज्ञं च॑कृ॒मा व॒यम्॥

यथा॑ । वि॒द्वान् । अर॑म् । कर॑त् । विश्वे॑भ्यः । य॒ज॒तेभ्यः॑ । अ॒यम् । अ॒ग्ने॒ । त्वे इति॑ । अपि॑ । यम् । य॒ज्ञम् । च॒कृ॒म । व॒यम् ॥

Mantra without Swara
यथा विद्वाँ अरं करद्विश्वेभ्यो यजतेभ्यः। अयमग्ने त्वे अपि यं यज्ञं चकृमा वयम्॥

यथा। विद्वान्। अरम्। करत्। विश्वेभ्यः। यजतेभ्यः। अयम्। अग्ने। त्वे इति। अपि। यम्। यज्ञम्। चकृम। वयम्॥

Ashtak » 2 Adhyay » 5 Varga » 26 Mantra » 8

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1 Bhashyas
Meaning
हे (अग्ने) विद्वान् ! (यथा) जैसे (अयम्) यह (विद्वान्) आप्तजन (विश्वेभ्यः) समस्त (यजतेभ्यः) विद्वानों की सेवा करनेवालों से पाई हुई विद्याओं से (अरम्) दूसरों को परिपूर्ण (करत्) करता है और जैसे (त्वे) तेरे निमित्त (यम्) जिस (यज्ञम्) यज्ञ को (वयम्) हम लोग परिपूर्ण (चकृम) करें वैसे तूं (अपि) भी कर ॥८॥
Essence
इस मन्त्र में उपमा और वाचकलुप्तोपमालङ्कार हैं। जैसे आप्त विद्वान् जन जगत् के लिये सत्योपदेश कर मनुष्यों को सत्य बोधवाले करते हैं, वैसे सब आप्त विद्वानों को निरन्तर अनुष्ठान करना-कराना चाहिये ॥८॥ इस सूक्त में जीव, ईश्वर, विद्वान् और विदुषियों के गुणों का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की पिछले सूक्तार्थ के साथ सङ्गति समझनी चाहिये ॥ यह दूसरे मण्डल में पाँचवाँ सूक्त और छब्बीसवाँ वर्ग समाप्त हुआ ॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है।