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Rigveda Mandal 2 / Sukta 5 / Mantra 6

43 Sukta
8 Mantra
2/5/6
Devata- अग्निः Rishi- सोमाहुतिर्भार्गवः Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
यदी॑ मा॒तुरुप॒ स्वसा॑ घृ॒तं भर॒न्त्यस्थि॑त। तासा॑मध्व॒र्युराग॑तौ॒ यवो॑ वृ॒ष्टीव॑ मोदते॥

यदि॑ । मा॒तुः । उप॑ । स्वसा॑ । घृ॒तम् । भर॑न्ती । अस्थि॑त । तासा॑म् । अ॒ध्व॒र्युः । आऽग॑तौ । यवः॑ । वृ॒ष्टीऽइ॑व । मो॒द॒ते॒ ॥

Mantra without Swara
यदी मातुरुप स्वसा घृतं भरन्त्यस्थित। तासामध्वर्युरागतौ यवो वृष्टीव मोदते॥

यदि। मातुः। उप। स्वसा। घृतम्। भरन्ती। अस्थित। तासाम्। अध्वर्युः। आऽगतौ। यवः। वृष्टीऽइव। मोदते॥

Ashtak » 2 Adhyay » 5 Varga » 26 Mantra » 6

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1 Bhashyas
Meaning
(यदि) जो (घृतम्) जल को (उप, भरन्ती) समीप होकर भरनेवाली (मातुः) माता की (स्वसा) बहिन वा (तासाम्) उन पूर्वोक्त कन्याओं की अध्यापिका (अस्थित) स्थित होती है तो त्विक् और (अध्वर्युः) यज्ञ का करनेवाला यज्ञ को (आगतौ) प्राप्त होकर आनन्दित होते हैं वैसे वा (यवः) (वृष्टीव) वृष्टि से ओषधि वैसे (मोदते) हर्ष को प्राप्त होती है ॥६॥
Essence
इस मन्त्र में उपमा और वाचकलुप्तोपमालङ्कार हैं। यदि कन्याजन अध्यापिका विदुषी और माता को प्राप्त होकर विदुषी होती हैं, तो जल से ओषधियों के समान सब ओर से वृद्धि को प्राप्त होती हैं ॥६॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है।