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Rigveda Mandal 2 / Sukta 5 / Mantra 3

43 Sukta
8 Mantra
2/5/3
Devata- अग्निः Rishi- सोमाहुतिर्भार्गवः Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
द॒ध॒न्वे वा॒ यदी॒मनु॒ वोच॒द्ब्रह्मा॑णि॒ वेरु॒ तत्। परि॒ विश्वा॑नि॒ काव्या॑ ने॒मिश्च॒क्रमि॑वाभवत्॥

द॒ध॒न्वे । वा॒ । यत् । ई॒म् । अनु॑ । वोच॑त् । ब्रह्मा॑णि । वेः । ऊँ॒ इति॑ । तत् । परि॑ । विश्वा॑नि । काव्या॑ । ने॒मिः । च॒क्रम्ऽइ॑व । अ॒भ॒व॒त् ॥

Mantra without Swara
दधन्वे वा यदीमनु वोचद्ब्रह्माणि वेरु तत्। परि विश्वानि काव्या नेमिश्चक्रमिवाभवत्॥

दधन्वे। वा। यत्। ईम्। अनु। वोचत्। ब्रह्माणि। वेः। ऊँ इति। तत्। परि। विश्वानि। काव्या। नेमिः। चक्रम्ऽइव। अभवत्॥

Ashtak » 2 Adhyay » 5 Varga » 26 Mantra » 3

Bhashya

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Meaning
सूर्य (यत्) जो (ईम्) जल को (दधन्वे) धारण करता है (वा) वा ब्रह्मवेत्ता (ब्रह्माणि) बड़े-बड़े ब्रह्मविषयों का (अनुवोचत्) बार-बार उपदेश करता है (तत्) उस सबको जिस कारण ईश्वर (वेः, उ) जानता ही है और (विश्वानि) समस्त (काव्या) उत्तम बुद्धिमानों के कर्मों को (परि) सब ओर से जानता ही है, इस कारण जैसे (नेमिः) धुरी (चक्रम्) पहिये को वर्त्तानेवाली होती, वैसे इस संसार के व्यवहारों को वर्त्तानेवाला विद्वान् (अभवत्) होता है ॥३॥
Essence
इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। सूर्य जल को धारण करता है वा विद्वान् जन ब्रह्मविषयादि को कहते हैं, उस सबको व्यापक परमेश्वर साङ्गोपाङ्ग जानता है ॥३॥
Subject
फिर ईश्वर के विषय को अगले मन्त्र में कहा है।

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