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Rigveda Mandal 2 / Sukta 41 / Mantra 8

43 Sukta
21 Mantra
2/41/8
Devata- अश्विनौ Rishi- गृत्समदः शौनकः Chhanda- विराड्गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
न यत्परो॒ नान्त॑र आद॒धर्ष॑द्वृषण्वसू। दुः॒शंसो॒ मर्त्यो॑ रि॒पुः॥

न । यत् । परः॑ । न । अन्त॑रः । आ॒ऽद॒धर्ष॑त् । वृ॒ष॒ण्व॒सू॒ इति॑ वृषण्ऽवसू । दुः॒ऽशंसः॑ । मर्त्यः॑ । रि॒पुः ॥

Mantra without Swara
न यत्परो नान्तर आदधर्षद्वृषण्वसू। दुःशंसो मर्त्यो रिपुः॥

न। यत्। परः। न। अन्तरः। आऽदधर्षत्। वृषण्वसू इति वृषण्ऽवसू। दुःऽशंसः। मर्त्यः। रिपुः॥

Ashtak » 2 Adhyay » 8 Varga » 8 Mantra » 3

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1 Bhashyas
Meaning
हे मनुष्यो ! (परः) उत्कृष्ट (दुःशंसः) जिसकी दुष्ट स्तुति विद्यमान वह (मर्त्यः) मरणधर्मा मनुष्य (रिपुः) शत्रु (यत्) जो (वृषण्वसू) वर्षानेवालों को बसाते हैं उनको (न,आदधर्षत्) न लचावे वा (अन्तरः) सामान्य दुष्ट स्तुतिवाला मरणधर्मा जिनको (न) न लचावे उनको कार्यों में नियुक्त करो ॥८॥
Essence
इस जगत् में वायु और अग्नि को कोई भी लचाय नहीं सकता और न इनका कोई शत्रु के समान नाश करनेवाला है, उस प्रकार से नहीं पराजित होने योग्य मनुष्यों को होना चाहिये ॥८॥
Subject
फिर उसी विषय को कहते हैं।