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Rigveda Mandal 2 / Sukta 41 / Mantra 7

43 Sukta
21 Mantra
2/41/7
Devata- अश्विनौ Rishi- गृत्समदः शौनकः Chhanda- त्रिपाद्गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
गोम॑दू॒ षु ना॑स॒त्याऽश्वा॑वद्यातमश्विना। व॒र्ती रु॑द्रा नृ॒पाय्य॑म्॥

गोऽम॑त् । ऊँ॒ इति॑ । सु । ना॒स॒त्या॒ । अस्व॑ऽवत् । या॒त॒म् । अ॒श्वि॒ना॒ । व॒र्तिः । रु॒द्रा॒ । नृ॒ऽपाय्य॑म् ॥

Mantra without Swara
गोमदू षु नासत्याऽश्वावद्यातमश्विना। वर्ती रुद्रा नृपाय्यम्॥

गोऽमत्। ऊँ इति। सु। नासत्या। अश्वऽवत्। यातम्। अश्विना। वर्तिः। रुद्रा। नृऽपाय्यम्॥

Ashtak » 2 Adhyay » 8 Varga » 8 Mantra » 2

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Meaning
हे मनुष्यो ! जैसे (नासत्या) असत्यरहित (रुद्रा) दुष्ट के रुलानेवाले (अश्विना) व्यापनशील अध्यापकोपदेशक (अश्वावत्) घोड़े के तुल्य (उ) वा (गोमत्) बहुत गायें जिसमें विद्यमान उस (नृपाय्यम्) मनुष्यों के माननेवाले (वर्त्तिः) मार्ग को (सुयातम्) अच्छे प्रकार प्राप्त होते हैं, वैसे तुम इनको प्राप्त होओ ॥७॥
Essence
मनुष्य यदि वायु और अग्नि के यान से यहाँ-वहाँ जावें, तो परिमित सुख पावें ॥७॥
Subject
अब अग्नि और वायु के गुणों को कहते हैं।

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