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Rigveda Mandal 2 / Sukta 41 / Mantra 4

43 Sukta
21 Mantra
2/41/4
Devata- मित्रावरुणौ Rishi- गृत्समदः शौनकः Chhanda- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
अ॒यं वां॑ मित्रावरुणा सु॒तः सोम॑ ऋतावृधा। ममेदि॒ह श्रु॑तं॒ हव॑म्॥

अ॒यम् । वा॒म् । मि॒त्रा॒व॒रु॒णा॒ । सु॒तः । सोमः॑ । ऋ॒त॒ऽवृ॒धा॒ । मम॑ । इत् । इ॒ह । श्र॒त॒म् । हव॑म् ॥

Mantra without Swara
अयं वां मित्रावरुणा सुतः सोम ऋतावृधा। ममेदिह श्रुतं हवम्॥

अयम्। वाम्। मित्रावरुणा। सुतः। सोमः। ऋतऽवृधा। मम। इत्। इह। श्रुतम्। हवम्॥

Ashtak » 2 Adhyay » 8 Varga » 7 Mantra » 4

Bhashya

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Meaning
हे (तावृधा) सत्य से बड़े हुए (मित्रावरुणा) प्राण और उदान के समान वर्त्तमान अध्यापको ! जो (अयम्) यह (वाम्) तुम दोनों से (सोमः) ओषधियों का रस (सुतः) उत्पन्न हुआ उसको पीके (इत्) ही (इह) यहाँ (मम) मेरे (हवम्) आह्वान को (श्रुतम्) सुनिये ॥४॥
Essence
जैसे वायु सबसे रस को ग्रहण कर वर्षाते हैं, वैसे ही सत्य विद्याओं को सुनकर सबके लिये सुख देना चाहिये ॥४॥
Subject
फिर उसी विषय को कहते हैं।

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