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Rigveda Mandal 2 / Sukta 41 / Mantra 11

43 Sukta
21 Mantra
2/41/11
Devata- इन्द्र: Rishi- गृत्समदः शौनकः Chhanda- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
इन्द्र॑श्च मृ॒ळ्या॑ति नो॒ न नः॑ प॒श्चाद॒घं न॑शत्। भ॒द्रं भ॑वाति नः पु॒रः॥

इन्द्रः॑ । च॒ । मृ॒ळया॑ति । नः॒ । न । नः॒ । प॒श्चात् । अ॒घम् । न॒श॒त् । भ॒द्रम् । भ॒वा॒ति॒ । नः॒ । पु॒रः ॥

Mantra without Swara
इन्द्रश्च मृळ्याति नो न नः पश्चादघं नशत्। भद्रं भवाति नः पुरः॥

इन्द्रः। च। मृळयाति। नः। न। नः। पश्चात्। अघम्। नशत्। भद्रम्। भवाति। नः। पुरः॥

Ashtak » 2 Adhyay » 8 Varga » 9 Mantra » 1

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1 Bhashyas
Meaning
जो (इन्द्रः) परमेश्वर (च) और उसका बनाया सूर्य (नः) हमको (मृळयाति) सुखी करे इससे (नः) हमारे (पुरः) अगले (पश्चात्) और पिछले (अघम्) पाप (न)(नशत्) प्राप्त हो किन्तु (नः) हमारे लिये यथार्थ (भद्रम्) कल्याण (भवाति) होवे ॥११॥
Essence
जो जगदीश्वर घटपटादिकों को जैसे सूर्य वैसे सबके आत्माओं को प्रकाशित करता है, जो उसके भक्त हैं, वे उससे भिन्न की उसके स्थान में नहीं उपासना करते हैं, वे सर्वव्यापक परमेश्वर को जान और वह हमें निरन्तर देखता है ऐसा मानकर अधर्माचरण नहीं करते हैं किन्तु निरन्तर धर्म ही का अनुष्ठान करते हैं, उनके आगामी पापाचरण की निवृत्ति और योगज सिद्धि विज्ञान के होने से मुक्ति होवे ही गी, औरों की नहीं, यह निश्चय है ॥११॥
Subject
फिर उसी विषय को तथा परमेश्वरोपासना विषय को कहते हैं।