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Rigveda Mandal 2 / Sukta 40 / Mantra 6

43 Sukta
6 Mantra
2/40/6
Devata- सोमापूषणावदितिश्च Rishi- गृत्समदः शौनकः Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
धियं॑ पू॒षा जि॑न्वतु विश्वमि॒न्वो र॒यिं सोमो॑ रयि॒पति॑र्दधातु। अव॑तु दे॒व्यदि॑तिरन॒र्वा बृ॒हद्व॑देम वि॒दथे॑ सु॒वीराः॑॥

धिय॑म् । पू॒षा । जि॒न्व॒तु॒ । वि॒श्व॒म्ऽइ॒न्वः । र॒यिम् । सोमः॑ । र॒यि॒ऽपतिः॑ । द॒धा॒तु॒ । अव॑तु । दे॒वी । अदि॑तिः । अ॒न॒र्वा । बृ॒हत् । व॒दे॒म॒ । वि॒दथे॑ । सु॒ऽवीराः॑ ॥

Mantra without Swara
धियं पूषा जिन्वतु विश्वमिन्वो रयिं सोमो रयिपतिर्दधातु। अवतु देव्यदितिरनर्वा बृहद्वदेम विदथे सुवीराः॥

धियम्। पूषा। जिन्वतु। विश्वम्ऽइन्वः। रयिम्। सोमः। रयिऽपतिः। दधातु। अवतु। देवी। अदितिः। अनर्वा। बृहत्। वदेम। विदथे। सुऽवीराः॥

Ashtak » 2 Adhyay » 8 Varga » 6 Mantra » 6

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1 Bhashyas
Meaning
हे विद्वानो ! जिस प्रकार से (पूषा) प्राण मेरी (धियम्) बुद्धि वा कर्म को (जिन्वतु) प्राप्त हो वा सुखी करे (विश्वमिन्वः) तथा जो विश्व को व्याप्त होता वह (रयिपतिः) धन की रक्षा करनेवाला (सोमः) पदार्थों का समूह (रयिम्) लक्ष्मी को (दधातु) धारण करे (अनर्वा) तथा जिसके अविद्यमान घोड़े हैं वह (देवी) दिव्यगुणवाली (अदितिः) माता बुद्धि वा कर्म की (अवतु) रक्षा करे जिससे (सुवीराः) शोभन वीरोंवाले हम लोग (विदथे) संग्राम में (बृहत्) बहुत (वदेम) कहें ॥६॥
Essence
हे मनुष्यो ! जैसे सब पदार्थ धन बुद्धि आरोग्यता और आयु के बढ़ानेवाले हों, वैसे विधान करो, जिससे सब मनुष्य बहुत सुख को प्राप्त होवें ॥६॥ इस सूक्त में प्राण अपान अग्नि वायु और विद्वानों के गुणों का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की पिछले सूक्त के अर्थ के साथ संगति है, यह जानना चाहिये ॥ यह चालीसवाँ सूक्त और छठा वर्ग समाप्त हुआ॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है।